जब हाथियों को गणेश का रूप मानकर शुरू हुई पूजा, आज बन गई मानव-हाथी सह-अस्तित्व की मिसाल

जशपुर के शेखरपुर में 2009 से चली आ रही ‘गज श्रद्धा’ की अनोखी परंपरा, गणेश उत्सव के जरिए ग्रामीण दे रहे वन्यजीव संरक्षण का संदेश
रायपुर। छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले में आस्था और प्रकृति के बीच जुड़ाव की एक अनोखी तस्वीर सामने आती है। पत्थलगांव वन परिक्षेत्र के ग्राम शेखरपुर में ग्रामीण पिछले कई वर्षों से गणेश उत्सव को जंगली हाथियों की स्मृति से जोड़कर मनाते आ रहे हैं। ग्रामीणों की यह परंपरा अब ‘गज श्रद्धा’ के नाम से मानव और हाथियों के बीच सुरक्षित सह-अस्तित्व का संदेश दे रही है।
2009 में हुई घटना ने बदली गांव की परंपरा
शेखरपुर में इस परंपरा की शुरुआत वर्ष 2009 में हुई थी। उस दौरान बिजली के करंट की चपेट में आने से दो जंगली हाथियों की मौत हो गई थी। घटना के बाद ग्रामीणों ने हाथियों को भगवान गणेश का प्रतीक मानते हुए हिंदू रीति-रिवाज से उनका अंतिम संस्कार किया।
इसके बाद उसी स्थान पर भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित की गई। तभी से हर वर्ष गणेश चतुर्थी के अवसर पर ग्रामीण यहां श्रद्धा के साथ गणेश उत्सव मनाते हैं।
समय के साथ यह आयोजन केवल धार्मिक कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसके जरिए ग्रामीणों में वन्यजीवों के प्रति संवेदनशीलता और हाथियों के संरक्षण का संदेश भी मजबूत हुआ।
‘गजरथ’ कार्यक्रम में लिया संरक्षण का संकल्प
इस वर्ष भी मानव-हाथी सह-अस्तित्व और वन्यजीव संरक्षण को लेकर 22 सितंबर 2026 को ग्राम शेखरपुर में ‘गजरथ’ कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम का आयोजन पत्थलगांव वन परिक्षेत्र द्वारा किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में ग्रामीण शामिल हुए।
वन विभाग के अधिकारियों और मैदानी कर्मचारियों ने ग्रामीणों को जंगली हाथियों के व्यवहार और उनके प्राकृतिक आवास के महत्व के बारे में जानकारी दी। साथ ही हाथियों से सुरक्षित दूरी बनाए रखने और मानव-हाथी संघर्ष की घटनाओं को कम करने के लिए जरूरी सावधानियां भी बताई गईं।
आस्था के साथ दिया सुरक्षा का संदेश
कार्यक्रम के दौरान ग्रामीणों को समझाया गया कि हाथियों के प्राकृतिक व्यवहार को समझना और उनके क्षेत्र में आवश्यक सावधानी बरतना मानव और वन्यजीव दोनों की सुरक्षा के लिए जरूरी है।
गांव की इस परंपरा में धार्मिक आस्था के साथ-साथ वन्यजीव संरक्षण का संदेश भी जुड़ गया है। कार्यक्रम का समापन गणेश प्रतिमा के विसर्जन के साथ हुआ।
शेखरपुर की ‘गज श्रद्धा’ क्यों है खास?
वन विभाग ने शेखरपुर के ग्रामीणों की वर्षों पुरानी परंपरा और उनकी भावनाओं की सराहना की है। विभाग के अनुसार, यह आयोजन केवल धार्मिक आस्था की अभिव्यक्ति नहीं है, बल्कि प्रकृति और वन्यजीवों के प्रति ग्रामीण समाज की संवेदनशीलता को भी सामने लाता है।
जशपुर जैसे वन क्षेत्र और हाथियों की मौजूदगी वाले इलाके में ऐसी पहल मानव-हाथी संघर्ष को कम करने और लोगों में जागरूकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
शेखरपुर की यह कहानी बताती है कि आस्था और प्रकृति संरक्षण साथ-साथ चल सकते हैं। ग्रामीणों की भागीदारी और वन विभाग के जागरूकता प्रयासों से हाथियों के संरक्षण तथा सुरक्षित सह-अस्तित्व का संदेश गांव से आगे भी पहुंच रहा है।












