
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, धर्म परिवर्तन के बाद पिछड़े वर्ग का दर्जा अपने आप नहीं मिलेगा, जानें पूरा मामला
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने धर्म परिवर्तन और आरक्षण से जुड़े एक अहम मामले में स्पष्ट किया है कि हिंदू समाज से गैर-हिंदू धर्म अपनाने पर व्यक्ति का पहले का सामाजिक पिछड़ापन अपने आप नए धर्म के किसी अधिसूचित पिछड़े वर्ग में सदस्यता का आधार नहीं बन सकता। शीर्ष अदालत ने तमिलनाडु सरकार की याचिका खारिज करते हुए मद्रास हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। यह मामला इस्लाम अपनाने वाले व्यक्तियों को पिछड़ा वर्ग (मुस्लिम) श्रेणी में आरक्षण का लाभ देने से संबंधित था।
15 अक्टूबर 2026 को न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति चंद्रशेखर की पीठ ने कहा कि केवल धर्म परिवर्तन के आधार पर किसी व्यक्ति को नए धर्म के किसी खास अधिसूचित पिछड़े वर्ग का सदस्य नहीं माना जा सकता। अदालत के मुताबिक, संविधान के अनुच्छेद 16(4) के तहत आरक्षण का दावा करने के लिए संबंधित सामाजिक श्रेणी की सदस्यता और लागू कानूनी शर्तों को पूरा करना जरूरी है।
क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने?
पीठ ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति की धर्म परिवर्तन से पहले की जाति या समुदाय की स्थिति को केवल धर्म बदलने के कारण नए धर्म की किसी दूसरी अधिसूचित पिछड़ा वर्ग श्रेणी की सदस्यता में नहीं बदला जा सकता।
अदालत ने कहा कि पहले की सामाजिक स्थिति से जुड़ा पिछड़ापन अपने आप नए धार्मिक सामाजिक ढांचे में किसी अलग पिछड़े वर्ग का दर्जा प्राप्त करने का कानूनी आधार नहीं बनता।
इस फैसले का मुख्य मुद्दा यह था कि क्या हिंदू धर्म से इस्लाम अपनाने वाला व्यक्ति केवल धर्म परिवर्तन के आधार पर पिछड़ा वर्ग (मुस्लिम) श्रेणी में शामिल होकर आरक्षण का लाभ मांग सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में मद्रास हाई कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
तमिलनाडु सरकार के आदेश पर क्यों उठा विवाद?
इस मामले की शुरुआत तमिलनाडु सरकार के 9 मार्च 2024 को जारी सरकारी आदेश से हुई थी। इसके तहत कुछ ऐसे व्यक्तियों को पिछड़ा वर्ग (मुस्लिम) समुदाय का प्रमाणपत्र जारी करने की व्यवस्था की गई थी, जो पहले पिछड़े वर्ग, सबसे पिछड़े वर्ग, विमुक्त समुदाय या अनुसूचित जाति से संबंधित थे और बाद में इस्लाम अपना चुके थे।
मद्रास हाई कोर्ट ने 25 जून को इस आदेश को गैरकानूनी ठहराते हुए रद्द कर दिया था। हाई कोर्ट का कहना था कि केवल इस्लाम अपनाने के आधार पर पिछड़ा वर्ग (मुस्लिम) श्रेणी में आरक्षण का अधिकार नहीं मिल जाता।
तमिलनाडु सरकार ने हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। लेकिन शीर्ष अदालत ने सरकार की याचिका खारिज कर दी और हाई कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा।
समीर अहमद के मामले से शुरू हुई कानूनी लड़ाई
इस मामले में समीर अहमद ने मद्रास हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उन्होंने 2015 में हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम अपनाया था और 2016 में राजपत्र अधिसूचना के माध्यम से धर्म परिवर्तन दर्ज कराया गया था।
इसके बाद उन्होंने इस्लामी रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह किया और आरक्षण का लाभ लेने के उद्देश्य से मुस्लिम लेब्बाई समुदाय का प्रमाणपत्र मांगा।
हालांकि, तहसीलदार ने उनका आवेदन खारिज कर दिया। इसके बाद उन्होंने अदालत में याचिका दायर की। मामले में राज्य सरकार ने दलील दी थी कि तमिलनाडु पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट के आधार पर पात्र व्यक्तियों को पिछड़ा वर्ग (मुस्लिम) समुदाय का प्रमाणपत्र जारी किया जा सकता है।
लेकिन हाई कोर्ट ने सरकार के आदेश को कानूनी प्रावधानों और पूर्व न्यायिक फैसलों के अनुरूप नहीं माना। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी हाई कोर्ट के फैसले में दखल देने से इनकार कर दिया।
क्या धर्म परिवर्तन करने वालों को अब आरक्षण नहीं मिलेगा?
इस फैसले को यह मानना सही नहीं होगा कि धर्म परिवर्तन करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को हर परिस्थिति में आरक्षण से वंचित कर दिया गया है। अदालत के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या केवल धर्म परिवर्तन के आधार पर किसी दूसरी अधिसूचित पिछड़ा वर्ग श्रेणी की सदस्यता हासिल की जा सकती है।
आरक्षण की पात्रता संबंधित कानूनों, अधिसूचित समुदायों की सूची और लागू संवैधानिक प्रावधानों पर निर्भर करती है। इसलिए इस फैसले का अर्थ यह नहीं है कि सभी धर्मों या सभी आरक्षण श्रेणियों के लिए एक जैसा नियम लागू हो गया है।
फैसले का क्या होगा असर?
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से धर्म परिवर्तन के बाद पिछड़ा वर्ग प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया और पात्रता को लेकर महत्वपूर्ण कानूनी स्पष्टता सामने आई है। तमिलनाडु सरकार के उस आदेश को लागू नहीं किया जा सकेगा जिसे मद्रास हाई कोर्ट ने रद्द किया था और सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा।
इस मामले में अदालत ने जोर दिया कि किसी अधिसूचित पिछड़े वर्ग की सदस्यता केवल धर्म परिवर्तन के आधार पर स्वतः प्राप्त नहीं होती। आरक्षण से जुड़ा कोई भी दावा संबंधित कानूनी मानदंडों के अनुसार ही तय किया जाएगा।












