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डेढ़ साल की बेटी की मौत से टूटा परिवार, दुख में भी माता-पिता ने लिया बड़ा फैसला;

हरियाणा के महम में मासूम आस्था की मौत के बाद माता-पिता ने जताई नेत्रदान की इच्छा, बेटी की आंखों से दूसरे बच्चों की जिंदगी रोशन होने की उम्मीद

महम, हरियाणा। जिस घर में कभी डेढ़ साल की मासूम बेटी की किलकारियां गूंजती थीं, वहां अब मातम पसरा है। बेटी को खोने का दुख किसी भी माता-पिता के लिए शब्दों में बयां करना मुश्किल है। लेकिन इस असहनीय पीड़ा के बीच हरियाणा के महम निवासी दीपक परूथी और उनकी पत्नी रीना ने ऐसा फैसला लिया, जो दूसरे परिवारों के जीवन में उम्मीद की किरण बन सकता है। अपनी डेढ़ साल की बेटी आस्था की मौत के बाद उन्होंने उसकी आंखें दान करने की इच्छा जताई, ताकि किसी जरूरतमंद को दुनिया देखने का अवसर मिल सके।

परिजनों के अनुसार, आस्था को पिछले दो दिनों से तेज बुखार था। बुखार के दौरान उसे उल्टियां भी हुईं। तबीयत बिगड़ने के बाद उसकी मौत हो गई। परिवार के लिए यह घटना किसी बड़े सदमे से कम नहीं थी। जिस उम्र में बच्चा ठीक से दुनिया को समझना शुरू करता है, उसी उम्र में आस्था के चले जाने से माता-पिता पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा।

बेटी को खोने के बाद भी दूसरों के लिए सोचा

आस्था की मौत के बाद परिवार ने गहरे दुख के बीच नेत्रदान की संभावना को लेकर संबंधित चिकित्सकों से संपर्क किया। माता-पिता की इच्छा थी कि उनकी बेटी की आंखों से किसी अन्य बच्चे को दुनिया देखने का अवसर मिल सके।

यह फैसला ऐसे समय में लिया गया, जब परिवार खुद अपने सबसे बड़े दुख से गुजर रहा था। माता-पिता की इस पहल ने अंगदान और नेत्रदान के महत्व को एक बार फिर सामने ला दिया है।

हालांकि, नेत्रदान की प्रक्रिया में चिकित्सकीय जांच और निर्धारित मानकों का पालन जरूरी होता है। उपलब्ध जानकारी में यह स्पष्ट नहीं है कि आस्था की आंखों का प्रत्यारोपण पूरा हो चुका है या केवल नेत्रदान की इच्छा जताई गई है। इसलिए दो बच्चों को रोशनी मिलने की बात को फिलहाल उम्मीद के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।

डेरा सच्चा सौदा से जुड़ा है परिवार

जानकारी के अनुसार, दीपक परूथी का परिवार डेरा सच्चा सौदा से जुड़ा हुआ है। डेरा अनुयायी रामदास इंसा ने बताया कि संस्था लोगों को नेत्रदान के प्रति जागरूक करने का काम करती है। उनके मुताबिक, महम में यह नेत्रदान से जुड़ा तीसरा मामला है।

नेत्रदान के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए सामाजिक संस्थाएं समय-समय पर लोगों को आगे आने के लिए प्रेरित करती हैं। ऐसी पहल का उद्देश्य उन लोगों की मदद करना है, जिन्हें कॉर्निया संबंधी समस्याओं के कारण देखने में परेशानी होती है।

नेत्रदान से कैसे मिल सकती है किसी को रोशनी?

नेत्रदान के माध्यम से आंख के पारदर्शी हिस्से कॉर्निया का प्रत्यारोपण किया जा सकता है। कॉर्निया आंख के सामने की पारदर्शी परत होती है, जो रोशनी को आंख के भीतर पहुंचाने में मदद करती है। कुछ प्रकार के कॉर्निया संबंधी अंधत्व में प्रत्यारोपण से मरीज की दृष्टि बेहतर हो सकती है।

हालांकि, नेत्रदान से हर तरह के अंधत्व का इलाज संभव नहीं है। यह भी जरूरी है कि दान किए गए ऊतक चिकित्सकीय रूप से प्रत्यारोपण के योग्य हों। दान के बाद किस मरीज को लाभ मिलेगा, यह चिकित्सकीय मूल्यांकन और उपलब्धता पर निर्भर करता है।

मासूम आस्था की याद में मानवता का संदेश

आस्था की मौत ने परिवार को ऐसा दुख दिया है, जिसकी भरपाई संभव नहीं है। लेकिन इस दुख के बीच नेत्रदान की इच्छा जताकर माता-पिता ने दूसरों की जिंदगी के बारे में भी सोचा।

यह घटना बताती है कि नेत्रदान के प्रति जागरूकता और सही समय पर चिकित्सकीय सहायता कितनी महत्वपूर्ण है। आस्था की आंखों से किसी जरूरतमंद को रोशनी मिल पाएगी या नहीं, यह चिकित्सकीय प्रक्रिया पर निर्भर करेगा, लेकिन परिवार की इस भावना ने नेत्रदान के महत्व को जरूर उजागर किया है।

मासूम आस्था अब अपने परिवार के बीच नहीं है, लेकिन उसके माता-पिता की यह पहल दूसरे परिवारों के लिए उम्मीद और संवेदना का संदेश लेकर आई है।

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