
संभल हिंसा मामले में न्यायिक आयोग की रिपोर्ट सामने आने के बाद पुलिस और प्रशासन की तैयारियों को लेकर कई सवाल खड़े हो गए हैं। रिपोर्ट में हालांकि किसी अधिकारी को सीधे तौर पर जिम्मेदार नहीं ठहराया गया है, लेकिन घटनाक्रम से यह संकेत मिलता है कि प्रशासन को संभावित तनाव की जानकारी पहले से थी और इसके बावजूद हिंसा को रोकने के लिए उठाए गए कदम पर्याप्त साबित नहीं हो सके।
रिपोर्ट के अनुसार, नवंबर 2024 में हुए मस्जिद सर्वे के दौरान पहले ही विरोध के संकेत मिलने लगे थे। 19 नवंबर को सर्वे के पहले चरण के दौरान बड़ी संख्या में लोग मस्जिद के बाहर जमा हुए थे और सर्वे रोकने का प्रयास किया गया था। इसके बाद 22 नवंबर को जुमे की नमाज के दौरान सामान्य से अधिक भीड़ जुटी थी। आयोग ने माना कि उस समय यह स्पष्ट था कि आने वाला सर्वे संवेदनशील हो सकता है और इसके लिए अतिरिक्त सतर्कता की जरूरत थी।
इसके बावजूद 24 नवंबर को स्थिति अचानक हिंसक हो गई। रिपोर्ट में बताया गया कि प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था के लिए अतिरिक्त पुलिस बल बुलाया था, बैरिकेडिंग की गई थी और अर्द्धसैनिक बलों की तैनाती भी की गई थी। जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक खुद मौके पर मौजूद थे। लेकिन सुबह होते-होते बड़ी संख्या में भीड़ जमा हो गई और हालात नियंत्रण से बाहर हो गए।
हिंसा के दौरान पुलिस पर पथराव और फायरिंग की घटनाएं हुईं। कुछ उपद्रवियों ने चेहरे ढक रखे थे। पुलिसकर्मियों से हथियार और कारतूस छीनने की घटनाएं भी सामने आईं। इसके अलावा कई सरकारी और निजी वाहनों को आग के हवाले कर दिया गया। इन घटनाओं ने भीड़ नियंत्रण व्यवस्था और सुरक्षा तैयारियों की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े किए।
आयोग ने संभल के पुराने सांप्रदायिक इतिहास का भी उल्लेख किया है। रिपोर्ट में 1936 से 2019 तक हुई विभिन्न घटनाओं का जिक्र करते हुए शहर को संवेदनशील क्षेत्र बताया गया है। आयोग का कहना है कि ऐसे हालात में प्रशासन को पहले से ज्यादा सतर्क और रणनीतिक तैयारी करनी चाहिए थी।
हालांकि रिपोर्ट में पुलिस प्रशासन की भूमिका की कुछ मामलों में प्रशंसा भी की गई है। आयोग ने कहा कि हिंसा के दौरान पुलिस ने स्थिति को संभालने का प्रयास किया और उपद्रवियों को अन्य क्षेत्रों में फैलने से रोका। विशेष रूप से उन परिस्थितियों में पुलिस की कार्रवाई को प्रभावी बताया गया जब हिंसा फैलने का खतरा बढ़ रहा था।
आयोग ने दिए कई सुझाव
भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए न्यायिक आयोग ने कई सुझाव दिए हैं। इनमें सोशल मीडिया पर निगरानी बढ़ाना, विभिन्न समुदायों के बीच संवाद को मजबूत करना, खुफिया तंत्र यानी एलआईयू को और प्रभावी बनाना तथा संवेदनशील इलाकों में पहले से बेहतर तैयारी करना शामिल है।
नेताओं ने रिपोर्ट पर उठाए सवाल
वहीं, समाजवादी पार्टी के नेताओं ने रिपोर्ट पर सवाल उठाए हैं। सांसद जियाउर्रहमान बर्क ने आरोप लगाया कि हिंसा में निर्दोष लोगों को निशाना बनाया गया और पुलिस कार्रवाई पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जांच से लोगों को न्याय मिलने की उम्मीद थी, लेकिन रिपोर्ट से निराशा हुई।
रामपुर सांसद मोहिबुल्ला नदवी ने भी मामले में राजनीतिक रंजिश का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि जनप्रतिनिधियों की भूमिका लोगों को शांत करने की होती है और मामले में लगाए गए आरोपों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
संभल हिंसा की यह रिपोर्ट भविष्य में संवेदनशील परिस्थितियों में प्रशासनिक तैयारी, खुफिया इनपुट और भीड़ नियंत्रण व्यवस्था को मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर देती है।
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