सूखे में भी नहीं हारती ‘सुपर क्रॉप’, अब खाद्य संकट से लड़ने में जुटे वैज्ञानिक

ब्रिटेन में Grass Pea जैसी कठिन परिस्थितियों में उगने वाली फसलों पर शोध तेज,
Grass Pea में क्या है खास?
Grass Pea, जिसे खेसारी दाल के नाम से भी जाना जाता है, कठिन परिस्थितियों में उगने वाली फसल है। सूखे और कम पानी जैसी परिस्थितियों को सहने की इसकी क्षमता वैज्ञानिकों के लिए खास रुचि का विषय है।
जलवायु परिवर्तन के कारण खेती के सामने पानी की कमी, बढ़ता तापमान और मौसम में अनिश्चितता जैसी चुनौतियां बढ़ रही हैं। ऐसे में वैज्ञानिक उन फसलों के गुणों को समझने की कोशिश कर रहे हैं जो प्रतिकूल परिस्थितियों में भी उत्पादन दे सकती हैं।
हालांकि Grass Pea को सीधे तौर पर खाद्य संकट का समाधान कहना सही नहीं होगा। इसके इस्तेमाल से जुड़ी एक अहम चुनौती भी है।
खेसारी दाल में मौजूद है स्वास्थ्य जोखिम
Grass Pea में प्राकृतिक रूप से ODAP नामक एक न्यूरोटॉक्सिन पाया जा सकता है। लंबे समय तक अधिक मात्रा में इसका सेवन स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हो सकता है।
इसी वजह से वैज्ञानिक ऐसी किस्मों को विकसित करने और उनकी पहचान करने पर काम कर रहे हैं जिनमें ODAP का स्तर कम हो। यदि सुरक्षित किस्मों और बेहतर कृषि तकनीकों का विकास होता है, तो यह फसल भविष्य की जलवायु-सहिष्णु कृषि में उपयोगी भूमिका निभा सकती है।
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क्यों बढ़ रही है ऐसी फसलों की जरूरत?
दुनिया की आबादी बढ़ने के साथ खाद्य उत्पादन की मांग भी बढ़ रही है। दूसरी ओर जलवायु परिवर्तन पारंपरिक कृषि व्यवस्था के लिए नई चुनौतियां पैदा कर रहा है।
ऐसे में वैज्ञानिकों का ध्यान केवल गेहूं, चावल और मक्का जैसी प्रमुख फसलों तक सीमित नहीं है। कम पानी में उगने वाली और कठिन मौसम को सहन करने वाली फसलों के आनुवंशिक गुणों का अध्ययन भी महत्वपूर्ण हो गया है।
Grass Pea इसी व्यापक शोध का एक उदाहरण है।












