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SIR पर CEC के फैसलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, कोर्ट ने कहा- गलत हुआ तो रद्द कर देंगे

नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार पर चुनाव आयोग के अन्य दोनों आयुक्तों की सहमति के बिना Special Intensive Revision (SIR) और मतदाता सूची से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले लेने के आरोपों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू हो गई है। मामले में अदालत ने चुनाव आयोग से जवाब मांगा है।

याचिकाकर्ताओं की ओर से आरोप लगाया गया है कि चुनाव आयोग के तीन सदस्यीय ढांचे में फैसले सामूहिक रूप से लिए जाने चाहिए, जबकि कुछ महत्वपूर्ण निर्णयों में अन्य चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों के बावजूद आगे बढ़ा गया। सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य सवालों में से एक यही है कि क्या CEC अकेले चुनाव आयोग के नाम पर ऐसे फैसले ले सकते हैं।

कोर्ट ने कहा- 10 दिन में कुछ ऐसा नहीं हो जाएगा

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल किसी तरह की रोक लगाने के बजाय मामले में जवाब मांगने का रास्ता अपनाया। कोर्ट ने कहा कि 10 दिन में ऐसा कुछ नहीं हो जाएगा कि स्थिति को सुधारा न जा सके। यदि बाद में यह पाया जाता है कि कोई कदम गलत था, तो अदालत उसे रद्द कर सकती है।

कोर्ट ने यह भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि याचिका का आधार जिस न्यूज रिपोर्ट को बनाया गया है, वह पूरी तरह सही, आंशिक रूप से सही या गलत भी हो सकती है। इसलिए केवल मीडिया रिपोर्ट के आधार पर अदालत कोई अंतिम आदेश नहीं दे सकती।

इस टिप्पणी से साफ है कि अदालत फिलहाल आरोपों की सत्यता और चुनाव आयोग की वास्तविक प्रक्रिया को उसके जवाब के आधार पर समझना चाहती है।

आखिर विवाद किस बात पर है?

मामला चुनाव आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया से जुड़ा है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि CEC ज्ञानेश कुमार ने अन्य चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की सहमति के बिना कुछ महत्वपूर्ण फैसले लिए।

सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने वाले पक्ष का कहना है कि CEC तीन सदस्यीय आयोग में “first among equals” यानी अन्य आयुक्तों के बराबर रहते हुए केवल प्रथम सदस्य हैं। याचिका में तर्क दिया गया है कि उनके पास अन्य चुनाव आयुक्तों के मुकाबले कोई अलग वीटो या अतिरिक्त मतदान अधिकार नहीं है।

14 बार आपत्ति जताने का दावा

सुप्रीम कोर्ट में पहुंची याचिका की पृष्ठभूमि में एक मीडिया रिपोर्ट का भी उल्लेख है। इसमें दावा किया गया था कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने करीब 10 महीने की अवधि में कम से कम 14 बार कुछ फैसलों को लेकर आपत्ति दर्ज की थी।

इनमें मतदाता सूची से जुड़े Form 6 में बदलाव, चुनावी डेटा के प्रबंधन और ECINet/ERONet से संबंधित व्यवस्थाओं जैसे मुद्दे शामिल बताए गए हैं। हालांकि, इन आरोपों की अंतिम पुष्टि होना अभी बाकी है और यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से जवाब मांगा है।

Form 6 में बदलाव भी सवालों के घेरे में

याचिका में मतदाता पंजीकरण से जुड़े Form 6 में कथित बदलाव का मुद्दा भी उठाया गया है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि जुलाई 2026 में फॉर्म में ऐसा विवरण जोड़ा गया, जिसमें आवेदकों से पिछले SIR के बाद मतदाता सूची में शामिल होने से संबंधित जानकारी मांगी गई।

याचिका के अनुसार, इस बदलाव को लेकर चुनाव आयुक्तों के बीच भी मतभेद थे और सवाल उठाया गया कि क्या मौजूदा नियमों में औपचारिक संशोधन के बिना ऐसा बदलाव किया जा सकता है।

ECINet और मतदाता डेटा को लेकर भी सवाल

मामले में चुनावी डेटाबेस के केंद्रीकरण का मुद्दा भी उठाया गया है। याचिका में आरोप है कि ECINet के जरिए चुनावी डेटा और मतदाता सूची के प्रबंधन में बदलाव किए गए तथा कुछ Electoral Registration Officers (EROs) की पहुंच को लेकर भी आपत्तियां सामने आईं।

याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि मतदाता सूची तैयार करने और संशोधित करने की वैधानिक जिम्मेदारी संबंधित EROs की है। इसलिए तकनीकी व्यवस्था में बदलाव करते समय उनकी वैधानिक भूमिका प्रभावित नहीं होनी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट के सामने बड़ा संवैधानिक सवाल

इस मामले का महत्व सिर्फ SIR तक सीमित नहीं है। इसके पीछे बड़ा सवाल यह है कि तीन सदस्यीय चुनाव आयोग के भीतर निर्णय लेने की संवैधानिक और वैधानिक प्रक्रिया क्या होगी।

Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners Act, 2023 की धारा 18 के मुताबिक आयोग अपने कामकाज की प्रक्रिया निर्धारित कर सकता है और जहां संभव हो, फैसले सर्वसम्मति से लेने की व्यवस्था है। यदि सदस्यों के बीच मतभेद हो तो कानून में बहुमत के आधार पर निर्णय का प्रावधान है।

याचिकाकर्ता इसी प्रावधान का हवाला देते हुए सवाल उठा रहे हैं कि जब आयोग में तीन सदस्य हैं, तो क्या किसी एक सदस्य द्वारा अकेले महत्वपूर्ण निर्णय लिए जा सकते हैं।

कोर्ट ने फिलहाल कोई अंतिम फैसला नहीं दिया

सुप्रीम कोर्ट ने इस चरण पर यह तय नहीं किया है कि CEC ने नियमों का उल्लंघन किया या नहीं। अदालत ने चुनाव आयोग से जवाब मांगा है और आगे की सुनवाई में दोनों पक्षों के तर्क तथा रिकॉर्ड देखे जाएंगे।

इसलिए फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि SIR से जुड़े फैसले गैरकानूनी पाए गए हैं। अदालत का अगला रुख चुनाव आयोग के जवाब और मामले में सामने आने वाले दस्तावेजों पर निर्भर करेगा।

पहले भी SIR को लेकर सुप्रीम कोर्ट में पहुंच चुके हैं मामले

SIR को लेकर इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं पहुंच चुकी हैं। दिल्ली में SIR के दौरान मतदाताओं को भेजे गए कथित “logical discrepancy” नोटिस पर भी सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से स्पष्टीकरण मांगा था और नोटिस की भाषा तथा अतिरिक्त फिल्टर की जरूरत पर सवाल उठाए थे।

वहीं CEC की कथित एकतरफा निर्णय प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर के अंत में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया था। अब इस मामले में चुनाव आयोग का जवाब आगे की कानूनी प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण होगा।

 

 

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