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बकरेश्वर में मिला कीमती गैस , जानिए क्यों दुनिया के लिए इतना खास है यह गैस

गर्म पानी के कुंडों से निकलने वाली गैस में मिली हीलियम की मौजूदगी, वैज्ञानिकों की नजर इस संभावित प्राकृतिक संसाधन पर

पश्चिम बंगाल के बकरेश्वर इलाके का नाम अब सिर्फ गर्म पानी के कुंडों के लिए नहीं, बल्कि एक बेहद महत्वपूर्ण गैस की मौजूदगी के कारण भी चर्चा में है। वैज्ञानिक अध्ययनों में यहां के गर्म जलस्रोतों से निकलने वाली गैस में हीलियम की उल्लेखनीय मात्रा दर्ज की गई है। NIT दुर्गापुर के अनुसार बकरेश्वर-तांत्रोई भू-तापीय क्षेत्र में हॉट स्प्रिंग गैस में हीलियम की मात्रा लगभग 1.88 से 2.77 प्रतिशत तक दर्ज की गई है।

हीलियम को आम लोग गुब्बारे में भरी जाने वाली गैस के रूप में जानते हैं, लेकिन इसकी असली अहमियत कहीं ज्यादा है। इसका इस्तेमाल MRI मशीनों, वैज्ञानिक अनुसंधान, क्रायोजेनिक्स, सेमीकंडक्टर उद्योग और अंतरिक्ष एवं तकनीकी क्षेत्रों में किया जाता है। MRI जैसी तकनीकों में बेहद कम तापमान हासिल करने के लिए लिक्विड हीलियम महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

क्या बकरेश्वर में हीलियम का बहुत बड़ा भंडार है?

यहीं सबसे बड़ा सवाल है। वैज्ञानिक शोध में बकरेश्वर-तांत्रोई क्षेत्र के नीचे संभावित बड़े हीलियम रिजर्व की ओर संकेत किया गया है, लेकिन इसे अभी व्यावसायिक रूप से सिद्ध और बड़े पैमाने पर निकाला जा सकने वाला भंडार कहना जल्दबाजी होगी। NIT दुर्गापुर के अध्ययन में इस क्षेत्र में लगभग 60 हॉट स्प्रिंग्स का उल्लेख है और पूरे क्षेत्र में हीलियम संसाधन की संभावनाओं का अध्ययन जारी बताया गया है।

दिलचस्प बात यह है कि बकरेश्वर से हीलियम की मौजूदगी कोई बिल्कुल नई खोज नहीं है। 1991 में संसद में भी बकरेश्वर के गर्म जलस्रोत से हीलियम गैस निकलने और उसे प्राप्त करने के प्रयासों से जुड़ा सवाल उठ चुका था। सरकारी जवाब में कहा गया था कि वहां हीलियम की रिकवरी पर काम चल रहा था।

हीलियम इतना कीमती क्यों है?

हीलियम धरती पर सीमित मात्रा में उपलब्ध संसाधन है और इसे कृत्रिम रूप से बनाना व्यावहारिक नहीं माना जाता। प्राकृतिक स्रोतों से इसकी रिकवरी और शुद्धिकरण ही मुख्य रास्ता है। भारत में अभी व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य घरेलू हीलियम उत्पादन सीमित है, जबकि देश की चिकित्सा और हाई-टेक इंडस्ट्री में इसकी जरूरत बनी हुई है।

यानी बकरेश्वर की धरती के नीचे मौजूद संभावित हीलियम संसाधन भविष्य में भारत के लिए रणनीतिक महत्व रख सकते हैं—लेकिन इसके लिए विस्तृत सर्वेक्षण, भंडार का आकलन और आर्थिक रूप से व्यवहार्य निष्कर्षण तकनीक जरूरी होगी।

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