
इटली की मितेनी से खरीदी गई मैन्युफैक्चरिंग इंफ्रास्ट्रक्चर रत्नागिरी में इस्तेमाल, पीएफएएस पर भारत में अब भी कोई विशेष पर्यावरणीय प्रतिबंध नहीं
मुंबई/रत्नागिरी। इटली में गंभीर पर्यावरणीय विवाद से जुड़ी मितेनी एसपीए की उत्पादन संबंधी मशीनरी और मैन्युफैक्चरिंग इंफ्रास्ट्रक्चर भारत के महाराष्ट्र में पहुंचने के बाद पर्यावरण सुरक्षा को लेकर बहस तेज हो गई है। यह मामला इसलिए गंभीर है क्योंकि मितेनी का नाम इटली के विसेंज़ा क्षेत्र में पीएफएएस यानी ‘फॉरएवर केमिकल्स’ से जुड़े बड़े प्रदूषण विवाद से जुड़ा रहा है। भारत में इसी कंपनी से संबंधित मैन्युफैक्चरिंग इंफ्रास्ट्रक्चर खरीदकर रत्नागिरी के लोटे परशुराम औद्योगिक क्षेत्र में इस्तेमाल किया गया है।
इटली में क्या हुआ था?
मितेनी इटली के विसेंज़ा क्षेत्र में फ्लोरोकेमिकल उत्पादन से जुड़ी कंपनी थी। कंपनी के खिलाफ पीएफएएस रसायनों से जल और मिट्टी के प्रदूषण को लेकर गंभीर आरोप लगे थे। वर्ष 2018 में कंपनी बंद हो गई। 2025 में इटली की अदालत ने कंपनी के पूर्व अधिकारियों और प्रबंधकों को पर्यावरण प्रदूषण मामले में कुल 141 साल की सजा सुनाई। इस फैसले के बाद मितेनी से जुड़ा मामला एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय चर्चा में आया।
पीएफएएस रसायनों को आम तौर पर ‘फॉरएवर केमिकल्स’ कहा जाता है, क्योंकि इनके कई प्रकार पर्यावरण में लंबे समय तक बने रह सकते हैं और आसानी से नष्ट नहीं होते। यही वजह है कि दुनिया के कई देशों में इन रसायनों को लेकर सख्त निगरानी और नियंत्रण की मांग लगातार बढ़ रही है।
दिमाग पर संभावित असर
- बच्चों के मस्तिष्क विकास पर असर: कुछ अध्ययनों में पीएफएएस के संपर्क और बच्चों के विकास तथा न्यूरो-बिहेवियरल बदलावों के बीच संबंध मिले हैं।
- ध्यान और व्यवहार: शोध में पीएफएएस संपर्क और एडीएचडी जैसे न्यूरो-विकास संबंधी परिणामों के बीच संभावित संबंधों की जांच की गई है, हालांकि प्रमाण अभी पूरी तरह निर्णायक नहीं हैं।
- याददाश्त: मानवों में पीएफएएस और याददाश्त से जुड़े परिणामों पर सीमित और मिश्रित प्रमाण उपलब्ध हैं।
- भ्रूण और बच्चों के लिए चिंता ज्यादा: गर्भावस्था के दौरान संपर्क और शुरुआती बचपन का समय मस्तिष्क विकास के लिहाज से संवेदनशील माना जाता है। कुछ शोध पीएफएएस को बच्चे के विकास में बदलाव से जोड़ते हैं।
- दिमाग तक पहुंच: कुछ पीएफएएस शरीर में रक्त के जरिए विभिन्न ऊतकों तक पहुंच सकते हैं और एटीएसडीआर के अनुसार कुछ पीएफएएस रक्त-मस्तिष्क से संबंधित ऊतकों/प्रोटीन से भी जुड़ सकते हैं।
“फॉरएवर केमिकल्स केवल पर्यावरण में लंबे समय तक बने रहने की वजह से चिंता का विषय नहीं हैं; वैज्ञानिक शोध इनके संपर्क और बच्चों के मस्तिष्क विकास तथा न्यूरो-बिहेवियरल प्रभावों के बीच संभावित संबंधों की भी जांच कर रहा है।”
इटली की मशीनरी महाराष्ट्र कैसे पहुंची?
भारत सरकार ने राज्यसभा में दिए जवाब में बताया कि लक्ष्मी ऑर्गेनिक इंडस्ट्रीज लिमिटेड ने वर्ष 2021-22 के दौरान इटली की मितेनी एसपीए से मैन्युफैक्चरिंग इंफ्रास्ट्रक्चर खरीदा था। यह इंफ्रास्ट्रक्चर महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के लोटे परशुराम औद्योगिक क्षेत्र में स्थापित परियोजना से जुड़ा है।
रिपोर्टों के अनुसार मितेनी के उपकरण, पेटेंट और तकनीकी क्षमताओं से संबंधित संपत्तियां नीलामी के जरिए खरीदी गई थीं। बाद में इन्हें भारत लाकर महाराष्ट्र में इस्तेमाल किया गया। द प्रिंट की रिपोर्ट के अनुसार लक्ष्मी ऑर्गेनिक ने मितेनी से मिली तकनीकी क्षमताओं को भारतीय नियमों के तहत दोबारा विकसित और उन्नत करने की बात कही है।
रत्नागिरी में क्या बन रहा है?
सरकार के राज्यसभा में दिए जवाब के मुताबिक रत्नागिरी की इकाई को तीन पीएफएएस पदार्थों के निर्माण के लिए संचालन की अनुमति मिली थी। इनमें पोटैशियम नॉनाफ्लोरोब्यूटेन सल्फोनेट, परफ्लुओरोट्राइप्रोपाइलामाइन और एक अन्य फ्लुओरिनयुक्त सल्फोनेट पदार्थ शामिल हैं।
सरकारी जवाब के अनुसार इनमें से केवल पोटैशियम नॉनाफ्लोरोब्यूटेन सल्फोनेट का उत्पादन वित्त वर्ष 2025-26 में शुरू हुआ था और दिसंबर 2025 से उसका उत्पादन बंद कर दिया गया।
यहां एक महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकार ने यह भी कहा है कि भारत में पीएफएएस के निर्माण पर कोई विशेष पर्यावरणीय प्रतिबंध लगाने वाला कानून फिलहाल मौजूद नहीं है। यही बात इस पूरे मामले को लेकर सबसे बड़ा सवाल पैदा करती है।
भारत में नियमों की कमी पर सवाल
इटली में जिस तरह पीएफएएस प्रदूषण को लेकर गंभीर कानूनी और पर्यावरणीय कार्रवाई हुई, उसके बाद भारत में ऐसे रसायनों के लिए व्यापक और स्पष्ट नियमों की कमी चिंता का विषय बन रही है।
सरकार ने संसद में स्वीकार किया कि पीएफएएस के निर्माण पर कोई विशेष पर्यावरणीय प्रतिबंध नहीं है। हालांकि कुछ पीएफएएस आधारित पदार्थ कृषि रसायनों के रूप में विभिन्न कानूनों के तहत सूचीबद्ध हैं और कुछ के इस्तेमाल पर प्रतिबंध या नियंत्रण है।
यहीं से सरकार की पर्यावरण नीति पर सवाल उठता है। जब किसी रसायन को लेकर पूरी दुनिया में स्वास्थ्य और पर्यावरण संबंधी चिंताएं बढ़ रही हों, तब भारत में उसके लिए अलग से व्यापक निगरानी व्यवस्था क्यों नहीं है?
क्या भारत को इटली की गलती से सबक नहीं लेना चाहिए?
सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि इटली की मशीनरी भारत में आई या नहीं। सरकार स्वयं संसद में इसकी पुष्टि कर चुकी है। असली सवाल यह है कि क्या भारत में ऐसी तकनीक को इस्तेमाल करने से पहले उसके दीर्घकालिक पर्यावरणीय प्रभाव का पर्याप्त आकलन किया गया?
रत्नागिरी जैसे तटीय और पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र में रासायनिक उद्योगों को लेकर स्थानीय स्तर पर पहले भी चिंता व्यक्त की गई है। इस मामले को लेकर स्थानीय नागरिकों और राजनीतिक नेताओं ने पर्यावरणीय सुरक्षा तथा निगरानी को लेकर सवाल उठाए हैं।
सरकार का पक्ष भी जानना जरूरी
सरकार और संबंधित कंपनी का पक्ष पूरी तरह अलग है। सरकारी जवाब के अनुसार संबंधित इकाई को पर्यावरणीय मंजूरी मिली है और महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण मंडल के अनुसार एफ्लुएंट ट्रीटमेंट सिस्टम तथा एयर पॉल्यूशन कंट्रोल सिस्टम चालू हैं। सरकार ने यह भी बताया कि 4 नवंबर 2025 के संयुक्त निगरानी नमूने के परिणाम स्वीकृत मानकों के भीतर थे।
लक्ष्मी ऑर्गेनिक ने भी कहा है कि उसने मितेनी को उसके पुराने उत्पादों को उसी रूप में दोहराने के लिए नहीं खरीदा था, बल्कि विशेष तकनीकी क्षमताओं के लिए संपत्तियां हासिल की थीं, जिन्हें भारत में दोबारा विकसित और उन्नत किया गया है। कंपनी ने अपने संचालन को भारतीय पर्यावरणीय मंजूरियों के अनुरूप बताया है।
फिर भी सबसे बड़ा सवाल कायम
सरकार का कहना है कि मौजूदा व्यवस्था के तहत संयंत्र को मंजूरी मिली है और निगरानी व्यवस्था काम कर रही है। लेकिन आलोचना इस बात को लेकर है कि पीएफएएस जैसे लंबे समय तक पर्यावरण में बने रहने वाले रसायनों के लिए भारत में अलग और व्यापक पर्यावरणीय मानक क्यों नहीं हैं।
अगर किसी रसायन के संभावित खतरों को लेकर दुनिया के दूसरे देशों में नियम लगातार सख्त किए जा रहे हैं, तो भारत में केवल मौजूदा सामान्य पर्यावरणीय मानकों के भरोसे रहना पर्याप्त है या नहीं—इस पर सरकार को स्पष्ट जवाब देना चाहिए।
भारत की पर्यावरण नीति पर उठता सवाल
यह मामला केवल महाराष्ट्र की एक फैक्ट्री का नहीं है। यह भारत की औद्योगिक और पर्यावरणीय नीति के बीच संतुलन का सवाल है।
भारत को रोजगार, निवेश और औद्योगिक विकास की जरूरत है, लेकिन विकास के नाम पर ऐसे रसायनों के संभावित खतरे को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी विदेशी तकनीक या पुराने औद्योगिक संयंत्र को भारत में लाने से पहले स्वतंत्र पर्यावरणीय जांच, भूजल की नियमित जांच, पीएफएएस की निगरानी और स्थानीय लोगों के स्वास्थ्य की दीर्घकालिक निगरानी जैसी व्यवस्थाएं पर्याप्त रूप से मौजूद हों।
इटली की मितेनी से जुड़ी मैन्युफैक्चरिंग इंफ्रास्ट्रक्चर का महाराष्ट्र में इस्तेमाल होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि रत्नागिरी में इटली जैसा प्रदूषण हो रहा है। लेकिन यह जरूर सवाल खड़ा करता है कि भारत पीएफएएस जैसे ‘फॉरएवर केमिकल्स’ से निपटने के लिए कितना तैयार है।
सरकार द्वारा संसद में यह स्वीकार किया जाना कि पीएफएएस निर्माण पर भारत में कोई विशेष पर्यावरणीय प्रतिबंध नहीं है, इस बहस को और गंभीर बना देता है। अब जरूरत केवल उद्योगों को मंजूरी देने की नहीं, बल्कि ऐसी मजबूत निगरानी व्यवस्था बनाने की है जिससे भविष्य में किसी संभावित पर्यावरणीय संकट का खामियाजा स्थानीय लोगों को न भुगतना पड़े।












