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ग्वालियर में बीएड छात्रों की राशि पर किसने किया खेल? जांच रिपोर्ट भी लापता

फर्जी हस्ताक्षर और बैंक खातों के जरिए आवास योजना की रकम निकालने का आरोप, दो कॉलेज जांच के घेरे में

ग्वालियर। मध्य प्रदेश के ग्वालियर में बीएड छात्रों की आवास योजना की राशि में कथित गड़बड़ी का मामला सामने आया है। आरोप है कि दो निजी बीएड कॉलेजों में पढ़ने वाले छात्रों के नाम पर फर्जी दस्तावेज और हस्ताक्षर का इस्तेमाल कर आवास सहायता की रकम दूसरे बैंक खातों में मंगाई गई और फिर निकाल ली गई। मामले को लेकर प्रशासन से शिकायत की गई है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब जांच समिति गठित हुई और छात्रों के बयान व दस्तावेज भी सामने आए, तो उसकी रिपोर्ट कहां चली गई?

शिकायतकर्ता महाराज सिंह ने कलेक्टर से मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। शिकायत में दो कॉलेजों का नाम शामिल है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और जांच के अंतिम निष्कर्ष सामने आना अभी बाकी है।

किन दो कॉलेजों पर लगे आरोप?

शिकायत के अनुसार, मामला ग्वालियर के इन दो संस्थानों से जुड़ा है:

  • आदर्श कॉलेज ऑफ एज्युकेशन, बड़ागांव, मुरार, ग्वालियर।
  • इंस्टीट्यूट ऑफ प्रोफेशनल एंड टेक्निकल एजुकेशन, पिपरौली, ग्वालियर।

आरोप है कि दोनों संस्थानों में बीएड की पढ़ाई कर रहे छात्रों की आवास योजना की राशि से संबंधित दस्तावेजों में अनियमितताएं की गईं। शिकायतकर्ता ने प्रशासन से पूरे मामले की जांच कर जिम्मेदार लोगों की पहचान करने की मांग की है।

छात्रों की जानकारी के बिना खुलवाए गए बैंक खाते?

शिकायत में दावा किया गया है कि कुछ छात्रों के पहले से बैंक खाते होने के बावजूद उनके नाम पर दूसरे बैंकों में खाते खुलवाए गए। आरोप है कि इसके लिए छात्रों की जानकारी या सहमति के बिना कथित तौर पर फर्जी हस्ताक्षर, किरायानामा, परिवार पहचान संबंधी दस्तावेज और अन्य कागजात का इस्तेमाल किया गया।

शिकायत के मुताबिक, आवास योजना की राशि इन खातों में जमा कराई गई और फिर निकाली गई। यदि जांच में ये आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह विद्यार्थियों के हितों और सरकारी सहायता राशि के वितरण में गंभीर अनियमितता का मामला हो सकता है।

जांच समिति बनी, फिर रिपोर्ट कहां गई?

इस प्रकरण में सबसे अहम सवाल जांच समिति की रिपोर्ट को लेकर उठ रहा है। शिकायतकर्ता महाराज सिंह के अनुसार, संभागायुक्त, कलेक्टर और शासन स्तर पर शिकायत किए जाने के बाद जांच दल गठित किया गया था।

बताया गया है कि जांच समिति के सामने संबंधित छात्रों के बयान और उपलब्ध दस्तावेज भी प्रस्तुत किए गए थे। इसके बावजूद शिकायतकर्ता का आरोप है कि जांच रिपोर्ट के बारे में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं मिल रही है।

अब सवाल उठता है कि जांच पूरी हुई या नहीं, रिपोर्ट तैयार हुई तो उसे किस अधिकारी के पास भेजा गया और यदि रिपोर्ट तैयार नहीं हुई, तो इसकी वजह क्या है? इन सवालों का जवाब प्रशासनिक रिकॉर्ड और संबंधित अधिकारियों के आधिकारिक पक्ष से ही स्पष्ट हो सकेगा।

कलेक्टर से निष्पक्ष जांच की मांग

मामले में कलेक्टर को दिए गए शिकायत आवेदन के जरिए पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की गई है। शिकायत में कथित फर्जी दस्तावेजों, हस्ताक्षरों और बैंक खातों की जांच के साथ आवास योजना की राशि के लेन-देन की पड़ताल किए जाने की जरूरत बताई गई है।

जांच में यह स्पष्ट होना जरूरी है कि किन छात्रों के नाम पर राशि जारी हुई, पैसा किन खातों में पहुंचा, उसे किसने निकाला और दस्तावेजों के सत्यापन की प्रक्रिया कैसे पूरी हुई। साथ ही, पहले गठित जांच समिति की रिपोर्ट का पता लगाकर उसकी स्थिति सार्वजनिक करना भी महत्वपूर्ण होगा।

छात्रों की सहायता राशि पर उठे सवाल

सरकारी योजनाओं का उद्देश्य पात्र विद्यार्थियों को आर्थिक सहायता देना है, ताकि वे अपनी पढ़ाई जारी रख सकें। ऐसे में यदि किसी योजना की राशि में फर्जीवाड़े के आरोप सामने आते हैं, तो उनकी निष्पक्ष और समयबद्ध जांच जरूरी हो जाती है।

फिलहाल, उपलब्ध जानकारी शिकायत में लगाए गए आरोपों पर आधारित है। दोनों कॉलेजों की जिम्मेदारी, कथित अनियमितताओं में शामिल लोगों और जांच रिपोर्ट की स्थिति को लेकर अंतिम निष्कर्ष जांच तथा प्रशासन के आधिकारिक जवाब के बाद ही निकाला जा सकता है।

 

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