
नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के विजयादशमी उत्सव के दौरान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने एक महत्वपूर्ण संबोधन दिया। उन्होंने देश में समाज की एकता, आत्मबोध और ‘स्व’ की भावना को सर्वोपरि रखने की आवश्यकता पर बल दिया। अपने संबोधन में उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत की विविधता में एकता का मूल आधार सनातन दर्शन और साझा राष्ट्रीय पहचान है। जब तक समाज आपसी अपनत्व के भाव को मजबूत रखेगा, तब तक देश आत्मनिर्भर और सशक्त बना रहेगा।
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डॉ. भागवत ने संत शिरोमणि रविदास, स्वामी श्रद्धानंद (जिनके बलिदान के 100 वर्ष पूरे हुए हैं), स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती (जिनकी जन्म शताब्दी चल रही है) और राजनारायण बसु जैसे महान व्यक्तित्वों के योगदान को याद किया। उन्होंने कहा कि विपरीत परिस्थितियों में भी इन संतों ने समाज को एकजुट रखने और ‘स्व’ का भाव जगाने का सराहनीय कार्य किया।
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सरसंघचालक ने कहा कि हमारे संविधान की प्रस्तावना में निहित ‘हम भारत के लोग’ शब्द उसी आत्मबोध और भावनात्मक एकता का प्रतीक है, जिसने प्राचीन काल से विविधताओं वाले भारत को एक सूत्र में पिरोया है।
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समाज को संगठित रखने के लिए ‘स्वबोध’, ‘स्वदेशी’ और जीवन मूल्यों को अपनाने पर जोर दिया गया। उन्होंने चेतावनी दी कि जब-जब समाज इस साझी राष्ट्रीयता और एकता के भाव को भूला है, तब-तब देश कमजोर हुआ है।
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संघ के शताब्दी वर्ष के तहत चलाए गए व्यापक अभियानों का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि स्वयंसेवक देश के 4.61 लाख से अधिक गांवों, 41 हजार बस्तियों और लगभग 10.19 करोड़ परिवारों तक पहुंचे हैं। इसके साथ ही वैश्विक स्तर पर भी भारतीय जीवन दृष्टि के प्रति जिज्ञासा बढ़ रही है।
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सोशल मीडिया और आधुनिक तकनीक के दौर में युवा पीढ़ी को सही और गलत का फर्क समझाने के लिए विवेक और संस्कारों की आवश्यकता पर जोर दिया गया, ताकि वे भटकाव या नशे जैसी समस्याओं से दूर रहकर देश का नेतृत्व संभाल सकें।












