बस्तर के इस पवित्र पहाड़ पर फिर उठे सवाल, जानिए क्या है पूरा मामला?

नंदराज पर्वत पर फिर खनन की आहट से बवाल, 7200 पेड़ों की कटाई की मंजूरी का दावा; 2019 के आंदोलन की फिर हुई चर्चा
छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग के बीजापुर में नंदराज पर्वत एक बार फिर सुर्खियों में है। आदिवासी समाज की आस्था से जुड़े इस पहाड़ पर लौह अयस्क खनन और पेड़ों की कटाई को लेकर राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। बीजापुर विधायक विक्रम मंडावी ने राज्य सरकार पर नंदराज पर्वत को उद्योगपतियों को सौंपने का आरोप लगाते हुए खनन गतिविधियों पर तत्काल रोक लगाने की मांग की है। दूसरी ओर, उपलब्ध सरकारी अभिलेखों में बैलाडीला क्षेत्र से संबंधित खनन और वन स्वीकृति की प्रक्रियाएं भी दर्ज हैं।
सात साल पहले भी इसी पहाड़ को लेकर हुआ था बड़ा आंदोलन
नंदराज पर्वत का विवाद नया नहीं है। वर्ष 2019 में भी बैलाडीला क्षेत्र में खनन को लेकर आदिवासी समाज और स्थानीय ग्रामीणों ने बड़ा आंदोलन किया था। उस समय नंदराज पर्वत को स्थानीय आदिवासी समुदाय की आस्था और धार्मिक परंपराओं से जुड़ा बताया गया था।
विरोध के दौरान बड़ी संख्या में ग्रामीण सड़कों पर उतरे थे और खनन गतिविधियों का विरोध किया गया था। उस आंदोलन के बाद नंदराज पर्वत पर प्रस्तावित खनन को लेकर मामला लंबे समय तक चर्चा में रहा।
अब करीब सात साल बाद इसी क्षेत्र में दोबारा खनन और पेड़ कटाई की खबर सामने आने के बाद पुराने आंदोलन की यादें फिर ताजा हो गई हैं।
7200 पेड़ काटने की मंजूरी का दावा
30 सितंबर 2026 को सामने आई रिपोर्ट के अनुसार बीजापुर विधायक विक्रम मंडावी ने दावा किया कि नंदराज पर्वत क्षेत्र में पहले चरण में करीब 7200 पेड़ों की कटाई की मंजूरी दी गई है। उन्होंने आरोप लगाया कि इसी क्षेत्र से लौह अयस्क निकालने की प्रक्रिया भी शुरू हो गई है और खनिज के नमूने नगरनार भेजे जा चुके हैं।
विधायक ने इसे आदिवासी आस्था से जुड़ा मुद्दा बताते हुए सरकार से नंदराज पर्वत पर खनन तत्काल रोकने की मांग की है। उनका कहना है कि जिस पहाड़ को स्थानीय आदिवासी समाज देवस्थान के रूप में मानता है, वहां खनन को लेकर सरकार को स्थानीय लोगों की भावनाओं और अधिकारों का ध्यान रखना चाहिए।
क्या फिर से शुरू हो गया है खनन?
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि नंदराज पर्वत क्षेत्र में आखिर किस स्तर पर खनन की अनुमति और गतिविधियां चल रही हैं।
उपलब्ध सरकारी वन स्वीकृति रिकॉर्ड में छत्तीसगढ़ के बैलाडीला आयरन ओर माइन डिपॉजिट-4 से जुड़ी परियोजना दर्ज है। रिकॉर्ड में परियोजना को खनन के रूप में दर्शाया गया है और इसमें सीएमडीसी लिमिटेड का नाम दर्ज है। इस प्रस्ताव के लिए स्टेज-1 स्वीकृति 23 जून 2025 को दर्ज है और 20 नवंबर 2025 को इसे स्वीकृत दिखाया गया है।
यानी मामला केवल राजनीतिक आरोपों तक सीमित नहीं है। बैलाडीला क्षेत्र में खनन से संबंधित आधिकारिक स्वीकृति प्रक्रिया का रिकॉर्ड भी मौजूद है। हालांकि, नंदराज पर्वत के जिस हिस्से को लेकर मौजूदा विवाद है, वहां पेड़ कटाई और खनन की मौजूदा स्थिति को लेकर अलग-अलग दावे सामने आ रहे हैं।
आदिवासी समाज के लिए क्यों खास है नंदराज पर्वत?
नंदराज पर्वत केवल एक खनिज क्षेत्र नहीं है। बस्तर के आदिवासी समाज के लिए पहाड़, जंगल और जलस्रोत उनकी सामाजिक और सांस्कृतिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। नंदराज पर्वत को स्थानीय समुदाय धार्मिक आस्था से जोड़कर देखता रहा है।
इसी वजह से यहां खनन का मुद्दा सामने आते ही इसका असर केवल पर्यावरण या खनिज उत्पादन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आदिवासी अधिकार, धार्मिक आस्था, जंगल और स्थानीय विकास जैसे कई सवाल एक साथ खड़े हो जाते हैं।
2019 के आंदोलन की वजह से फिर बढ़ी चिंता
नंदराज पर्वत को लेकर 2019 में हुए आंदोलन के कारण इस इलाके का खनन विवाद पहले से ही संवेदनशील माना जाता रहा है। उस समय ग्रामीणों के विरोध के बाद पूरे देश में बैलाडीला और आदिवासी अधिकारों को लेकर चर्चा हुई थी।
अब एक बार फिर खनन और पेड़ कटाई की खबरों ने स्थानीय स्तर पर चिंता बढ़ा दी है। विपक्षी नेताओं ने सरकार पर निशाना साधते हुए सवाल उठाया है कि क्या पुराने विवाद से सबक लिए बिना फिर उसी क्षेत्र में खनन गतिविधियां बढ़ाई जा रही हैं।
सरकार का विकास और खनन को लेकर क्या पक्ष रहा है?
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय पहले बस्तर में उद्योग और विकास को लेकर कह चुके हैं कि स्थानीय लोगों से सलाह-मशविरा के बाद ही उद्योग लगाए जाएंगे और इसे जबरन नहीं किया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा था कि उद्योग स्थापित करने के लिए जनसुनवाई जैसी प्रक्रियाएं होती हैं।
वहीं दूसरी तरफ, सरकार अवैध खनन के खिलाफ कार्रवाई की बात भी करती रही है। जून 2026 में राज्य सरकार की ओर से अवैध खनन, परिवहन और भंडारण के खिलाफ कार्रवाई को लेकर जानकारी जारी की गई थी।
इसलिए नंदराज पर्वत का मौजूदा विवाद अब इस सवाल के साथ जुड़ गया है कि वैध खनन परियोजनाओं, पर्यावरणीय मंजूरियों और स्थानीय आदिवासी समुदाय की सहमति व अधिकारों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाएगा।
सबसे बड़ा सवाल: विकास या आस्था?
नंदराज पर्वत पर शुरू हुआ नया विवाद आने वाले दिनों में और बढ़ सकता है। एक तरफ बैलाडीला क्षेत्र छत्तीसगढ़ के सबसे महत्वपूर्ण लौह अयस्क क्षेत्रों में शामिल है और खनन से रोजगार, राजस्व तथा औद्योगिक गतिविधियों का रास्ता खुलता है। दूसरी तरफ स्थानीय आदिवासी समुदाय के लिए पहाड़ और जंगल उनकी संस्कृति, परंपरा और आस्था का हिस्सा हैं।
इसी टकराव के कारण नंदराज पर्वत का मामला सामान्य खनन परियोजना से अलग दिखाई देता है। अब नजर इस बात पर है कि सरकार और प्रशासन मौजूदा खनन गतिविधियों, पेड़ कटाई और स्थानीय समुदाय से जुड़े सवालों पर क्या स्पष्ट स्थिति रखते हैं।
फिलहाल उपलब्ध रिपोर्टों में 7200 पेड़ों की कटाई की मंजूरी और खनन गतिविधि को लेकर बीजापुर विधायक की ओर से गंभीर आरोप लगाए गए हैं। वहीं सरकारी रिकॉर्ड में बैलाडीला आयरन ओर डिपॉजिट-4 की खनन परियोजना की स्वीकृति दर्ज है। ऐसे में पूरे मामले की वास्तविक स्थिति समझने के लिए संबंधित स्वीकृतियों, वन अनुमति और स्थानीय स्तर की प्रक्रिया को एक साथ देखना जरूरी है।












