माओ का ‘फाइव फिंगर प्लान’ क्या है? भारत की सीमाओं पर चीन की रणनीति को समझिए

भारत और चीन के बीच सीमा विवाद लंबे समय से दोनों देशों के रिश्तों का संवेदनशील मुद्दा रहा है। अरुणाचल प्रदेश और लद्दाख को लेकर चीन के दावों के बीच अब माओ त्से-तुंग से जुड़ी ‘फाइव फिंगर प्लान’ की अवधारणा का भी जिक्र हो रहा है। इस रणनीति के तहत तिब्बत को चीन की ‘हथेली’ और उसके आसपास के पांच क्षेत्रों को ‘उंगलियां’ बताए जाने का दावा किया जाता है।
हालांकि, इस कथित ‘फाइव फिंगर प्लान’ को चीन की मौजूदा आधिकारिक नीति या किसी औपचारिक सरकारी दस्तावेज के रूप में पेश करना उचित नहीं होगा। यह अवधारणा मुख्य रूप से चीन की क्षेत्रीय रणनीति और तिब्बत के आसपास के इलाकों को लेकर उसके पुराने विस्तारवादी नजरिए की व्याख्या के तौर पर इस्तेमाल होती रही है।
क्या है माओ का ‘फाइव फिंगर’ सिद्धांत?
‘फाइव फिंगर’ अवधारणा में तिब्बत को चीन की ‘हथेली’ बताया जाता है, जबकि उसके आसपास लद्दाख, नेपाल, सिक्किम, भूटान और अरुणाचल प्रदेश को पांच ‘उंगलियों’ के रूप में जोड़ा जाता है।
इस अवधारणा का उल्लेख करते हुए अक्सर कहा जाता है कि चीन तिब्बत को अपने नियंत्रण में रखने के साथ-साथ उसके आसपास के क्षेत्रों में भी अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता था। इनमें से लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश सीधे भारत से जुड़े हैं, जबकि नेपाल, सिक्किम और भूटान हिमालयी क्षेत्र में भारत की सुरक्षा और रणनीतिक हितों से जुड़े हुए हैं।
लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश पर चीन का दावा
भारत-चीन सीमा विवाद में लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश दो प्रमुख क्षेत्र रहे हैं। चीन अक्साई चिन पर नियंत्रण रखता है और अरुणाचल प्रदेश पर भी अपना दावा करता है। बीजिंग अरुणाचल प्रदेश को ‘जांगनान’ या ‘दक्षिणी तिब्बत’ कहता है, जबकि भारत उसके इस दावे को पूरी तरह खारिज करता है।
भारत का स्पष्ट रुख है कि अरुणाचल प्रदेश देश का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा है। चीन की ओर से किसी क्षेत्र के नाम बदलने या उस पर दावा जताने से जमीन पर मौजूद स्थिति नहीं बदलती।
सीमा पर गतिविधियों से बढ़ी चिंता
अरुणाचल प्रदेश के ऊपरी सुबनसिरी जिले के तवांग क्षेत्र से जुड़े सीमावर्ती इलाकों में चीनी गतिविधियों को लेकर समय-समय पर चिंता सामने आती रही है। कुछ रिपोर्टों में स्थानीय लोगों और पारंपरिक चराई क्षेत्रों से जुड़े मुद्दों का भी उल्लेख किया गया है। हालांकि, सीमावर्ती क्षेत्रों में किसी कथित ‘धीरे-धीरे कब्जे’ जैसे दावों की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है और अलग-अलग रिपोर्टों में इस संबंध में अलग-अलग दावे सामने आए हैं।
भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी पर तनाव कम करने के लिए सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर बातचीत भी जारी रही है। दोनों देशों के बीच सीमा प्रबंधन और शांति बनाए रखना लंबे समय से बातचीत का प्रमुख मुद्दा रहा है।
क्या आज भी चीन ‘फाइव फिंगर प्लान’ पर काम कर रहा है?
यही इस पूरी अवधारणा का सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। माओ के दौर से जुड़ी ‘फाइव फिंगर’ व्याख्या को सीधे चीन की वर्तमान आधिकारिक रणनीति मान लेना सही नहीं होगा। चीन की मौजूदा विदेश और सीमा नीति कई रणनीतिक, सैन्य और भू-राजनीतिक कारकों से प्रभावित होती है।
फिर भी, तिब्बत, अरुणाचल प्रदेश और लद्दाख को लेकर चीन की स्थिति तथा हिमालयी क्षेत्र में उसकी बढ़ती रणनीतिक सक्रियता के कारण इस पुराने सिद्धांत का जिक्र अक्सर किया जाता है। भारत के लिए चुनौती सिर्फ किसी पुराने सिद्धांत की मौजूदगी नहीं, बल्कि एलएसी पर वास्तविक स्थिति, सीमा ढांचे और दोनों देशों के बीच क्षेत्रीय प्रभाव की प्रतिस्पर्धा है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह मुद्दा?
भारत के लिए हिमालयी सीमा केवल क्षेत्रीय विवाद का विषय नहीं है। लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक का क्षेत्र देश की सुरक्षा, रणनीतिक संपर्क और सीमावर्ती इलाकों के विकास के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है।
इसी वजह से भारत सीमा क्षेत्रों में सड़क, पुल, सुरंग और अन्य बुनियादी ढांचे को मजबूत करने पर जोर दे रहा है। दूसरी ओर, चीन भी तिब्बत और सीमावर्ती क्षेत्रों में अपना बुनियादी ढांचा लगातार विकसित कर रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम को देखते हुए ‘फाइव फिंगर प्लान’ इतिहास और रणनीतिक विश्लेषण के संदर्भ में चर्चा का विषय जरूर है, लेकिन इसे चीन की मौजूदा आधिकारिक नीति का प्रमाण मानने से पहले ऐतिहासिक स्रोतों और वर्तमान चीनी नीतिगत दस्तावेजों को अलग-अलग देखना जरूरी है।












