Hasdeo Arand News: राजस्थान की बिजली के लिए छत्तीसगढ़ के जंगलों की कीमत?

4.48 लाख पेड़ों पर संकट, आंकड़े बताते हैं पूरी कहानी
रायपुर/अंबिकापुर। छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में स्थित हसदेव अरण्य एक बार फिर कोयला खनन को लेकर चर्चा में है। राजस्थान के सरकारी बिजली उपक्रम राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड (RRVUNL) के लिए आवंटित Kente Extension Coal Block को लेकर केंद्र से सैद्धांतिक वन स्वीकृति मिलने के बाद जंगलों की कटाई का मुद्दा और गंभीर हो गया है। उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार इस परियोजना के लिए करीब 1,742.6 हेक्टेयर वन क्षेत्र को डायवर्ट करने और लगभग 4.48 लाख पेड़ों की कटाई का प्रस्ताव सामने आया है।
मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हसदेव अरण्य में कोयले के कई ब्लॉक राजस्थान के बिजली संयंत्रों के लिए आवंटित हैं। सवाल यह है कि राजस्थान की बिजली जरूरत पूरी करने के लिए छत्तीसगढ़ के इस घने वन क्षेत्र पर कितना अतिरिक्त दबाव जरूरी है? और क्या मौजूदा कोयला आपूर्ति, लिंक तथा दूसरे विकल्पों की क्षमता का पर्याप्त इस्तेमाल किया जा रहा है?
राजस्थान के लिए छत्तीसगढ़ में कितने कोयला ब्लॉक?
केंद्रीय कोयला मंत्रालय के उपलब्ध दस्तावेजों के मुताबिक हसदेव अरण्य कोलफील्ड में राजस्थान की RRVUNL को Parsa, Parsa East & Kanta Basan (PEKB) और Kente Extension जैसे ब्लॉक आवंटित किए गए हैं।
सरकारी दस्तावेज में इनकी प्रस्तावित/स्वीकृत उत्पादन क्षमता क्रमशः करीब 5 MTPA, 15 MTPA और 9 MTPA दर्ज है। यानी तीनों की संयुक्त क्षमता करीब 29 मिलियन टन सालाना यानी 2.9 करोड़ टन प्रति वर्ष तक पहुंच सकती है।
यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हसदेव अरण्य से राजस्थान के ताप विद्युत संयंत्रों के लिए कोयले की बड़ी मात्रा उपलब्ध कराने की योजना लंबे समय से मौजूद है।
लेकिन राजस्थान को वास्तव में कितने कोयले की जरूरत है?
सरकारी वन सलाहकार समिति के दस्तावेज में RRVUNL के 6 थर्मल पावर प्लांटों की कुल क्षमता 7,580 MW और उनकी वार्षिक कोयला जरूरत 35.12 मिलियन टन यानी करीब 3.51 करोड़ टन बताई गई थी। इनमें दो सुपर क्रिटिकल पावर प्लांटों की जरूरत करीब 11.06 MTPA बताई गई थी।
यहां आंकड़ों का दिलचस्प पहलू सामने आता है।
राजस्थान के छह संयंत्रों की दर्ज वार्षिक जरूरत – 35.12 MTPA
जबकि हसदेव अरण्य में RRVUNL से जुड़े तीन ब्लॉकों की संभावित संयुक्त क्षमता – 29 MTPA
अर्थात केवल इन तीन ब्लॉकों की क्षमता राजस्थान के दर्ज कुल कोयला आवश्यकता से करीब 6.12 MTPA कम बैठती है।
इससे यह कहना सही नहीं होगा कि राजस्थान को कोयले की जरूरत नहीं है। लेकिन इससे यह सवाल जरूर उठता है कि नई खदानों और अतिरिक्त वन क्षेत्र के डायवर्जन की आवश्यकता तय करते समय राजस्थान के मौजूदा कोयला लिंक, SECL से मिलने वाली आपूर्ति और अन्य स्रोतों को किस हद तक शामिल किया गया है।
राजस्थान ने खुद मांगी थी अतिरिक्त कोयला आपूर्ति
2022 में केंद्र सरकार से संबंधित दस्तावेज में राजस्थान की ओर से कोयला आपूर्ति बढ़ाने की मांग का भी उल्लेख है। राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री ने SECL/NCL से 42,500 मीट्रिक टन प्रतिदिन कोयला उपलब्ध कराने और RVUNL से जुड़े ताप विद्युत संयंत्रों के लिए अतिरिक्त रेलवे रेक की मांग की थी। दस्तावेज में यह भी दर्ज है कि राजस्थान ने PEKB के दूसरे चरण से जुड़ी भूमि और स्वीकृतियों को तेजी से पूरा करने की मांग की थी।
इसका मतलब यह है कि राजस्थान की बिजली व्यवस्था में कोयले की मांग वास्तविक है, लेकिन कोयला कहां से आए और उसके लिए कितने जंगल प्रभावित हों, यह अलग नीति और पर्यावरण का सवाल है।
4.48 लाख पेड़ काटने का प्रस्ताव क्यों बना बड़ा मुद्दा?
Kente Extension Coal Block को लेकर सबसे बड़ा पर्यावरणीय सवाल पेड़ों की कटाई का है।
मई 2026 में सामने आए दस्तावेजों के अनुसार RRVUNL ने Kente Extension के लिए 1,742.6 हेक्टेयर वन क्षेत्र के डायवर्जन और लगभग 4.48 लाख पेड़ों की कटाई का प्रस्ताव रखा था। परियोजना को केंद्र से सैद्धांतिक वन स्वीकृति भी मिल चुकी है।
यानी मामला सिर्फ जमीन के एक टुकड़े पर खनन का नहीं है। यह हजारों हेक्टेयर वन क्षेत्र, जैव विविधता और स्थानीय पारिस्थितिकी से जुड़ा मामला है।
हसदेव अरण्य का कुल कोयला क्षेत्र करीब 1,880 वर्ग किलोमीटर में फैला है और इसमें 23 कोयला ब्लॉक हैं। केंद्रीय कोयला मंत्रालय के दस्तावेजों में हसदेव अरण्य कोयला क्षेत्र के कुल भूगर्भीय कोयला भंडार का आंकड़ा करीब 5,529 मिलियन टन दिया गया था।
PEKB में पहले ही कितना जंगल प्रभावित हुआ?
एक हालिया वैज्ञानिक अध्ययन ने 2013 से 2025 तक PEKB ओपन-कास्ट खदान के विस्तार का सैटेलाइट इमेजरी के आधार पर अध्ययन किया। अध्ययन के मुताबिक खदान का सतही क्षेत्रफल 2013 में करीब 218 हेक्टेयर था, जो 2025 के मध्य तक बढ़कर करीब 1,389 हेक्टेयर हो गया।
अध्ययन ने अनुमान लगाया कि इस अवधि में करीब 1,013 हेक्टेयर घना वन क्षेत्र खदान के विस्तार से परिवर्तित हुआ।
यानी अब Kente Extension के लिए प्रस्तावित नया वन डायवर्जन इस बहस को और बड़ा कर देता है।
क्या राजस्थान के पास कोयले के दूसरे स्रोत नहीं हैं?
ऐसा कहना भी सही नहीं होगा कि राजस्थान केवल हसदेव अरण्य के कोयले पर निर्भर है।
सरकारी दस्तावेजों में RRVUNL के ताप विद्युत संयंत्रों के लिए SECL और अन्य कोयला लिंक का भी उल्लेख है। 2022 के सरकारी रिकॉर्ड में राजस्थान की ओर से CIL से जुड़े संयंत्रों के लिए अतिरिक्त कोयला और रेक की मांग दर्ज है।
यही वजह है कि अब असली सवाल “राजस्थान को कोयला चाहिए या नहीं?” से ज्यादा बड़ा है।
सवाल है—
क्या राजस्थान की पूरी कोयला जरूरत का आकलन करके यह तय किया गया है कि हसदेव अरण्य के इतने बड़े वन क्षेत्र को डायवर्ट करना कितना आवश्यक है?
और अगर कोयले की जरूरत है तो क्या—
- मौजूदा PEKB खदान की क्षमता,
- Parsa और Kente Extension की प्रस्तावित क्षमता,
- SECL/CIL से मिलने वाला कोयला,
- मौजूदा कोयला लिंक,
- रेलवे से आपूर्ति क्षमता,
- और बिजली उत्पादन की वास्तविक जरूरत
इन सभी का संयुक्त मूल्यांकन किया गया है?
29 MTPA बनाम 35.12 MTPA: आंकड़ों से समझिए मामला
| आंकड़ा | मात्रा |
|---|---|
| RRVUNL के 6 थर्मल प्लांटों की दर्ज वार्षिक कोयला जरूरत | 35.12 MTPA |
| PEKB की क्षमता | 15 MTPA |
| Parsa की क्षमता | 5 MTPA |
| Kente Extension की क्षमता | 9 MTPA |
| तीनों ब्लॉकों की संयुक्त क्षमता | 29 MTPA |
| दोनों के बीच अंतर | 6.12 MTPA |
| Kente Extension के लिए वन डायवर्जन | 1,742.6 हेक्टेयर |
| प्रस्तावित पेड़ कटाई | लगभग 4.48 लाख |
इन आंकड़ों से यह स्पष्ट है कि राजस्थान की कुल दर्ज कोयला आवश्यकता 35.12 MTPA है, जबकि हसदेव अरण्य में RRVUNL से जुड़े तीन ब्लॉकों की संयुक्त क्षमता करीब 29 MTPA है। इसलिए “राजस्थान को कोयले की जरूरत नहीं” कहना आंकड़ों के आधार पर सही नहीं होगा। लेकिन इतनी बड़ी पर्यावरणीय कीमत वाली परियोजना में वास्तविक अतिरिक्त आवश्यकता और उपलब्ध वैकल्पिक आपूर्ति की पारदर्शी गणना सार्वजनिक होना जरूरी है।
जंगल बनाम बिजली: असली सवाल यही
बिजली की जरूरत देश और राज्यों के लिए महत्वपूर्ण है। थर्मल पावर अभी भी बिजली व्यवस्था का अहम हिस्सा है और इसके लिए कोयले की आवश्यकता बनी हुई है। लेकिन हसदेव अरण्य जैसे संवेदनशील वन क्षेत्र में खनन का असर केवल पेड़ों की संख्या तक सीमित नहीं होता।
जंगल कटने के साथ वन्यजीवों का आवास, जल स्रोत, स्थानीय पारिस्थितिकी और आदिवासी समुदायों की आजीविका भी प्रभावित हो सकती है।
इसलिए बहस को केवल “कोयला चाहिए या नहीं” तक सीमित करने के बजाय यह पूछा जाना चाहिए कि कितना कोयला वास्तव में आवश्यक है, वह कहां से आएगा और उस आवश्यकता को पूरा करने के लिए कितने वन क्षेत्र का नुकसान स्वीकार्य है।
हसदेव अरण्य में राजस्थान के लिए कोयला खनन को लेकर उपलब्ध आंकड़े एक जटिल तस्वीर सामने रखते हैं। राजस्थान के बिजली संयंत्रों को कोयले की वास्तविक जरूरत है, लेकिन साथ ही RRVUNL के पास छत्तीसगढ़ में कई कैप्टिव कोयला ब्लॉक और अन्य कोयला आपूर्ति स्रोत भी हैं।
ऐसे में 4.48 लाख पेड़ों की प्रस्तावित कटाई और 1,742.6 हेक्टेयर वन क्षेत्र के डायवर्जन से पहले यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि अतिरिक्त कोयले की आवश्यकता का स्वतंत्र और पारदर्शी आकलन क्या कहता है।
हसदेव का सवाल अब सिर्फ छत्तीसगढ़ बनाम राजस्थान का नहीं, बल्कि बिजली की जरूरत और पर्यावरणीय कीमत के बीच संतुलन का सवाल बन चुका है।












