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महाराष्ट्र में अडानी के दो प्रोजेक्ट्स के लिए 83,700 वर्ग फुट वन भूमि का डायवर्जन, रायगढ़ में मैंग्रोव क्षेत्र भी शामिल

मुंबई। महाराष्ट्र में अडानी समूह से जुड़ी दो कंपनियों की परियोजनाओं के लिए करीब 83,700 वर्ग फुट वन भूमि के डायवर्जन को मंजूरी दिए जाने का मामला सामने आया है। महाराष्ट्र वन विभाग ने 11 अगस्त 2026 को दो अलग-अलग सरकारी आदेश जारी कर अडानी सीमेंटेशन लिमिटेड और अडानी टोटल गैस लिमिटेड को वन भूमि के इस्तेमाल की अनुमति दी।

दोनों परियोजनाओं के लिए स्वीकृत कुल क्षेत्र करीब 0.78 हेक्टेयर यानी लगभग 1.93 एकड़ है। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा रायगढ़ जिले के अलीबाग क्षेत्र का है, जहां प्रस्तावित रायगढ़ सीमेंट बल्क टर्मिनल से जुड़ी सुविधाओं के लिए आरक्षित वन और मैंग्रोव वन क्षेत्र की जमीन शामिल है।

यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि सरकारी आदेशों में इसे वन भूमि का डायवर्जन कहा गया है। इसलिए इसे सीधे “83,700 वर्ग फुट जंगल काटने की मंजूरी” कहना पूरी तरह सटीक नहीं होगा। वन भूमि को गैर-वन उपयोग के लिए इस्तेमाल करने की अनुमति दी गई है और इसके साथ कई शर्तें भी जुड़ी हैं।

रायगढ़ में करीब 70 हजार वर्ग फुट वन भूमि का डायवर्जन

पहले सरकारी आदेश के तहत करीब 0.6497 हेक्टेयर यानी लगभग 69,933 वर्ग फुट वन भूमि को अडानी सीमेंटेशन लिमिटेड की परियोजना के लिए डायवर्ट करने की मंजूरी दी गई है।

यह जमीन रायगढ़ जिले के अलीबाग तालुका के शाहापुर और शाहबाज गांवों में बताई गई है। इस क्षेत्र में आरक्षित वन के साथ नाला मैंग्रोव और क्रीक क्षेत्र के मैंग्रोव वन भी शामिल हैं।

इस भूमि का इस्तेमाल रायगढ़ सीमेंट बल्क टर्मिनल से जुड़ी विभिन्न सुविधाओं के निर्माण और विकास के लिए किया जाना है। इनमें बर्थिंग जेट्टी, कन्वेयर कॉरिडोर, संबंधित सुविधाएं और एप्रोच रोड जैसी संरचनाएं शामिल हैं।

मैंग्रोव क्षेत्र होने से मामला महत्वपूर्ण

रायगढ़ वाले प्रोजेक्ट का मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि स्वीकृत भूमि में मैंग्रोव वन क्षेत्र शामिल बताया गया है।

मैंग्रोव तटीय पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं। ये समुद्री तटों को कटाव से बचाने के साथ-साथ समुद्री जीव-जंतुओं और पक्षियों के लिए भी प्राकृतिक आवास उपलब्ध कराते हैं।

इसलिए मैंग्रोव क्षेत्र में किसी परियोजना के लिए भूमि के इस्तेमाल का मामला पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील माना जाता है।

अमरावती में प्राकृतिक गैस पाइपलाइन के लिए जमीन

दूसरे सरकारी आदेश के तहत अडानी टोटल गैस लिमिटेड को करीब 0.1281 हेक्टेयर यानी लगभग 13,788 वर्ग फुट वन भूमि के इस्तेमाल की अनुमति दी गई है।

यह भूमि अमरावती क्षेत्र में प्राकृतिक गैस वितरण नेटवर्क विकसित करने के लिए भूमिगत स्टील पाइपलाइन बिछाने के काम में इस्तेमाल की जाएगी।

इस परियोजना में वन भूमि के ऊपर बड़े निर्माण के बजाय भूमिगत पाइपलाइन से जुड़ा काम किया जाना है। हालांकि, इसके लिए भी वन भूमि के डायवर्जन की प्रक्रिया के तहत सरकारी अनुमति ली गई है।

दोनों परियोजनाओं को मिलाकर करीब 83,700 वर्ग फुट जमीन

दोनों सरकारी आदेशों में स्वीकृत क्षेत्र को मिलाने पर आंकड़ा करीब 83,721 वर्ग फुट बैठता है।

यानी मोटे तौर पर:

  • रायगढ़: करीब 69,933 वर्ग फुट
  • अमरावती: करीब 13,788 वर्ग फुट
  • कुल: करीब 83,721 वर्ग फुट
  • कुल क्षेत्रफल: लगभग 0.78 हेक्टेयर या 1.93 एकड़

क्या पूरी जमीन पर पेड़ काटे जाएंगे?

इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वन भूमि के डायवर्जन और पेड़ों की कटाई को एक ही चीज नहीं माना जाना चाहिए।

सरकारी आदेश में भूमि को गैर-वन उपयोग के लिए इस्तेमाल करने की अनुमति दी गई है। इसका अर्थ यह नहीं है कि पूरे 83,700 वर्ग फुट क्षेत्र में मौजूद हर पेड़ को काटने की अनुमति स्वतः मिल गई है।

परियोजना के लिए वन विभाग द्वारा निर्धारित शर्तों और पर्यावरणीय नियमों का पालन करना जरूरी होगा। रायगढ़ परियोजना के मामले में वन अधिकारियों को परियोजना क्षेत्र में निरीक्षण और निगरानी के लिए प्रवेश उपलब्ध कराने जैसी शर्तें भी बताई गई हैं।

वन और मैंग्रोव भूमि को लेकर स्थानीय स्तर पर चिंता

रायगढ़ के अलीबाग क्षेत्र में अडानी सीमेंटेशन की परियोजना के लिए वन भूमि के डायवर्जन को लेकर पर्यावरण और स्थानीय क्षेत्र से जुड़े लोगों के बीच चिंता सामने आ रही है। खास तौर पर इसलिए कि प्रस्तावित परियोजना के लिए डायवर्ट की जाने वाली करीब 69,933 वर्ग फुट भूमि में आरक्षित वन के साथ नाला मैंग्रोव और क्रीक मैंग्रोव क्षेत्र भी शामिल हैं। सरकारी दस्तावेजों में भी इस भूमि की मैंग्रोव स्थिति दर्ज है।

मामला सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर महाराष्ट्र और रायगढ़ से जुड़े लोगों की प्रतिक्रियाओं में मैंग्रोव संरक्षण को लेकर सवाल उठाए गए हैं। कुछ लोगों ने परियोजना के लिए मैंग्रोव भूमि के इस्तेमाल पर आपत्ति जताई, जबकि कुछ अन्य लोगों ने यह भी कहा कि कुल क्षेत्रफल करीब 0.78 हेक्टेयर यानी लगभग 1.93 एकड़ है और इसे 83,700 वर्ग फुट के रूप में बताने से आंकड़ा बड़ा दिखाई देता है।

सरकार ने 11 अगस्त को जारी किए आदेश

इस मामले की अहम तारीख 11 अगस्त 2026 है। इसी दिन महाराष्ट्र वन विभाग की ओर से दोनों परियोजनाओं के संबंध में अलग-अलग सरकारी आदेश जारी किए गए।

इसके बाद सोशल मीडिया और समाचार रिपोर्टों में यह मामला चर्चा में आया। खासतौर पर रायगढ़ में मैंग्रोव वन क्षेत्र शामिल होने के कारण पर्यावरण को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।

विकास बनाम पर्यावरण संरक्षण की बहस

वन भूमि के औद्योगिक और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए इस्तेमाल को लेकर हमेशा विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन का सवाल उठता है।

एक तरफ सीमेंट टर्मिनल और प्राकृतिक गैस पाइपलाइन जैसी परियोजनाएं औद्योगिक तथा बुनियादी ढांचे के विकास से जुड़ी हैं। दूसरी तरफ वन और मैंग्रोव जैसे प्राकृतिक क्षेत्रों के इस्तेमाल से पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर चिंता रहती है।

खासकर रायगढ़ में मैंग्रोव क्षेत्र शामिल होने के कारण इस परियोजना पर पर्यावरणीय निगरानी महत्वपूर्ण होगी।

सोशल मीडिया पर भी चर्चा

वन भूमि के डायवर्जन की जानकारी सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर भी इसे लेकर चर्चा शुरू हो गई है। कुछ लोग मैंग्रोव और वन भूमि के औद्योगिक इस्तेमाल पर सवाल उठा रहे हैं, जबकि कुछ लोगों का कहना है कि करीब 1.93 एकड़ भूमि को केवल वर्ग फुट में बताने से आंकड़ा बड़ा दिखाई दे सकता है।

हालांकि, असली सवाल सिर्फ जमीन के क्षेत्रफल का नहीं बल्कि किस प्रकार की वन भूमि का इस्तेमाल किया जा रहा है और उसके पर्यावरणीय प्रभाव को कैसे नियंत्रित किया जाएगा, इसका है।

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