हरियाली तिहार से सजेगा छत्तीसगढ़, खेतों में लहराएगी हरियाली; लोक परंपराओं और कृषि संस्कृति का दिखेगा रंग

रायपुर। सावन महीने के आगमन के साथ ही छत्तीसगढ़ में प्रकृति और लोकसंस्कृति से जुड़े पर्व-त्योहारों का उल्लास दिखाई देने लगा है। इसी कड़ी में हरियाली तिहार छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोकपरंपरा और कृषि संस्कृति से जुड़ा प्रमुख पर्व है। यह त्योहार हरियाली, खेती-किसानी, प्रकृति और खुशहाली का प्रतीक माना जाता है। बारिश के बाद जब खेतों में फसलें लहलहाने लगती हैं और चारों ओर हरियाली दिखाई देती है, तब ग्रामीण अंचलों में इस पर्व का उत्साह और बढ़ जाता है।
हरियाली तिहार का सीधा संबंध छत्तीसगढ़ की कृषि प्रधान जीवनशैली से है। प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में खेती केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि लोगों के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। सावन में पर्याप्त बारिश होने के बाद खेतों में धान सहित विभिन्न फसलों की हरियाली दिखाई देने लगती है। ऐसे समय में किसान अच्छी फसल, सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना के साथ प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।
हरियाली तिहार के दौरान गांवों में पारंपरिक लोकगीतों, लोकनृत्यों और सांस्कृतिक गतिविधियों का आयोजन किया जाता है। महिलाएं और युवतियां सावन के पारंपरिक गीत गाती हैं। कई स्थानों पर पेड़ों पर झूले लगाए जाते हैं, जहां महिलाएं और बच्चे उत्साह के साथ झूला झूलते हैं। घरों में पारंपरिक छत्तीसगढ़ी व्यंजन और पकवान भी बनाए जाते हैं। परिवार और रिश्तेदार एक-दूसरे से मिलकर त्योहार की खुशियां साझा करते हैं।
यह पर्व लोगों को पेड़-पौधों और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण का संदेश भी देता है। छत्तीसगढ़ अपनी समृद्ध वन संपदा के लिए जाना जाता है। आज के समय में जब पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन जैसे विषय महत्वपूर्ण हो गए हैं, तब हरियाली तिहार की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। इस अवसर पर पौधरोपण और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण का संकल्प लेकर पर्व की भावना को व्यापक रूप दिया जा सकता है।
हरियाली तिहार नई पीढ़ी को अपनी जड़ों और लोकपरंपराओं से जोड़ने का भी माध्यम है। सावन की फुहारों के बीच मनाया जाने वाला यह पर्व प्रकृति की सुंदरता, किसान जीवन की खुशहाली और प्रदेश की लोकसंस्कृति को एक साथ जोड़ता है।












