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दंतेवाड़ा लक्ष्य कोचिंग में बड़ा सवाल, 68 लाख का प्रस्ताव छोड़ 90 लाख वाली एजेंसी को मिला काम!

आदिवासी युवाओं की कोचिंग के लिए एजेंसी चयन पर विवाद, तीन निविदाओं के बाद भी उठ रहे पारदर्शिता के सवाल

रायपुर। छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में आदिवासी युवाओं को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराने वाले लक्ष्य कोचिंग सेंटर के संचालन को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। यहां कोचिंग संचालन की जिम्मेदारी देने के लिए ऐसी एजेंसी का चयन किया गया है, जिसने 90 लाख रुपये का प्रस्ताव दिया था। वहीं, 68 लाख 5 हजार रुपये में काम करने की पेशकश करने वाली एजेंसी को चयन प्रक्रिया से बाहर रखा गया। अब इस फैसले को लेकर निविदा प्रक्रिया, तकनीकी मूल्यांकन और वित्तीय अंकों पर सवाल उठाए जा रहे हैं।

मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि निविदा में तकनीकी योग्यता को 80 प्रतिशत और वित्तीय प्रस्ताव को 20 प्रतिशत महत्व दिया गया था। उपलब्ध अंकों और सामान्य आनुपातिक गणना के आधार पर सबसे कम कीमत देने वाली एजेंसी का कुल स्कोर चयनित एजेंसी से अधिक बताया जा रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर 90 लाख रुपये का प्रस्ताव देने वाली एजेंसी को काम किस आधार पर मिला?

आदिवासी युवाओं के लिए क्यों अहम है लक्ष्य कोचिंग सेंटर?

लक्ष्य कोचिंग सेंटर दंतेवाड़ा जिला प्रशासन की एक महत्वपूर्ण पहल है। इसका उद्देश्य आदिवासी और दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले युवाओं को प्रतियोगी परीक्षाओं की बेहतर तैयारी का अवसर देना है। आर्थिक स्थिति और भौगोलिक परेशानियों के कारण कई युवा रायपुर और दिल्ली जैसे शहरों में जाकर महंगी कोचिंग नहीं कर पाते। ऐसे युवाओं के लिए यह संस्थान काफी मददगार साबित हुआ है।

यहां संघ लोक सेवा आयोग, छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग, व्यापमं, कर्मचारी चयन आयोग, रेलवे और बैंकिंग परीक्षाओं की तैयारी कराई जाती है। संस्थान से प्रशिक्षण लेकर कई युवाओं का चयन डिप्टी कलेक्टर, डीएसपी, पटवारी सहित विभिन्न सरकारी पदों पर हो चुका है।

वर्ष 2026-27 के लिए जिला परियोजना कार्यालय, समग्र शिक्षा दंतेवाड़ा ने 14 शिक्षकों और तीन कार्यालयीन कर्मचारियों की सेवाएं लेने के लिए निविदा जारी की थी।

तीन बार निकली निविदा, पहली बार ही बदल गई पात्रता

इस पूरी प्रक्रिया में तीन बार निविदा जारी की गई। पहली निविदा 11 अगस्त 2026 को निकाली गई थी। इसमें एजेंसियों के लिए सोसायटी, कंपनी, एलएलपी या ट्रस्ट के तहत पंजीकृत होना और संस्था का कम से कम पांच साल पुराना होना जरूरी था।

हालांकि, 27 अगस्त को जारी संशोधन में गुमास्ता पंजीयन को भी स्वीकार्य दस्तावेजों में शामिल कर लिया गया। साथ ही निविदा जमा करने की अंतिम तारीख 31 अगस्त से बढ़ाकर 7 सितंबर कर दी गई।

इस बदलाव को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि जब मूल निविदा में पांच साल पुराने संस्थागत पंजीयन की शर्त थी, तो गुमास्ता पंजीयन को विकल्प के रूप में शामिल करने का आधार क्या था? क्या इससे पहले निर्धारित शर्तों के तहत अपात्र एजेंसियों को भी भाग लेने का अवसर मिला?

पहली निविदा में तीन एजेंसियों ने हिस्सा लिया था। तकनीकी मूल्यांकन में एक एजेंसी निर्धारित 80 प्रतिशत अंक हासिल नहीं कर सकी, जिसके बाद प्रक्रिया निरस्त कर दी गई।

दूसरी निविदा भी नहीं पहुंची नतीजे तक

15 सितंबर को दूसरी बार निविदा जारी की गई। इसमें शिवा एकलव्य शिक्षण संस्थान, प्रीमियर एकेडमी और सौरभ करियर प्राइवेट लिमिटेड ने हिस्सा लिया। लेकिन इस बार भी एक एजेंसी निर्धारित तकनीकी योग्यता पूरी नहीं कर पाई और निविदा निरस्त कर दी गई।

इसके बाद 13 अक्टूबर को तीसरी निविदा जारी हुई, जिसे 26 अक्टूबर को खोला गया। इस बार पांच एजेंसियों ने अपने प्रस्ताव जमा किए। इनमें शिवा एकलव्य शिक्षण संस्थान, मां शारदा विद्या एजुकेशनल सोसायटी, प्रीमियर एकेडमी, सौरभ करियर प्राइवेट लिमिटेड और निर्माण आईएएस शामिल थीं।

तकनीकी मूल्यांकन के बाद शिवा एकलव्य शिक्षण संस्थान और निर्माण आईएएस को अयोग्य घोषित कर दिया गया। शेष तीन एजेंसियों के वित्तीय प्रस्तावों का मूल्यांकन किया गया।

68 लाख और 90 लाख के प्रस्ताव में आखिर किसे मिला फायदा?

तीसरी निविदा के वित्तीय प्रस्तावों में तीन एजेंसियों की दरें सामने आईं।

  • सौरभ करियर प्राइवेट लिमिटेड : 68 लाख 5 हजार रुपये

  • मां शारदा विद्या एजुकेशनल सोसायटी : 69 लाख रुपये

  • प्रीमियर एकेडमी : 90 लाख रुपये

सबसे कम कीमत का प्रस्ताव सौरभ करियर ने दिया था, जबकि सबसे अधिक प्रस्ताव प्रीमियर एकेडमी का था। इसके बावजूद संचालन का काम प्रीमियर एकेडमी को दिए जाने की जानकारी सामने आई है।

अंकों की गणना में भी सामने आया अंतर

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, तकनीकी मूल्यांकन में सौरभ करियर को 87, मां शारदा को 85 और प्रीमियर एकेडमी को 92 अंक मिले थे।

यदि वित्तीय मूल्यांकन में सामान्य आनुपातिक फॉर्मूले के आधार पर गणना की जाए, तो सबसे कम दर देने वाली एजेंसी को 100 अंक मिलते हैं। इस हिसाब से सौरभ करियर को 100, मां शारदा को लगभग 98.6 और प्रीमियर एकेडमी को लगभग 75.6 अंक प्राप्त होते हैं।

तकनीकी और वित्तीय अंकों पर 80:20 का भार लागू करने पर संभावित कुल अंक इस प्रकार बनते हैं:

एजेंसी तकनीकी अंक वित्तीय अंक संभावित कुल स्कोर
सौरभ करियर 87 100 89.6
प्रीमियर एकेडमी 92 75.6 88.7
मां शारदा 85 98.6 87.7

इस गणना में सौरभ करियर सबसे आगे दिखाई देता है। इसके बावजूद प्रीमियर एकेडमी को काम मिलने से चयन प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं।

हालांकि, यह गणना सामान्य आनुपातिक फॉर्मूले पर आधारित है। वास्तविक चयन की पुष्टि निविदा में निर्धारित वित्तीय मूल्यांकन के फॉर्मूले, आधिकारिक अंकतालिका और अंतिम मेरिट सूची से ही हो सकती है। यदि निविदा में यही फॉर्मूला निर्धारित था और कोई अतिरिक्त शर्त लागू नहीं हुई, तो चयन के आधार पर स्पष्टीकरण जरूरी है।

तकनीकी मूल्यांकन के 25 अंकों का आधार क्या था?

एजेंसियों को दिए गए तकनीकी अंकों में 25 अंकों के मूल्यांकन को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। जानकारी के मुताबिक, इन अंकों का निर्धारण एजेंसियों के पुराने कार्यादेश, प्रस्तुतीकरण और शिक्षकों के वीडियो के आधार पर किया गया था। शिक्षकों के वीडियो पेन ड्राइव के माध्यम से जमा कराए गए थे।

ऐसे में सवाल है कि पुराने कार्यादेशों की संख्या और गुणवत्ता के लिए क्या मापदंड तय थे? एजेंसियों के प्रस्तुतीकरण को किस आधार पर अंक दिए गए? शिक्षकों के वीडियो का मूल्यांकन किस समिति ने किया और इसके लिए क्या मानक अपनाए गए?

इन सवालों का जवाब तकनीकी मूल्यांकन की विस्तृत अंकतालिका सार्वजनिक होने के बाद ही स्पष्ट हो सकता है।

चयन प्रक्रिया के दस्तावेज सार्वजनिक करने की मांग

निविदा में शामिल कुछ एजेंसियों की ओर से चयनित एजेंसी प्रीमियर एकेडमी के दस्तावेज देखने की मांग किए जाने की जानकारी भी सामने आई है। आरोप है कि उन्हें जरूरी दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए गए।

अब जिला प्रशासन से तीनों निविदाओं की तकनीकी मूल्यांकन रिपोर्ट, एजेंसियों को दिए गए अंक, वित्तीय गणना का फॉर्मूला, अंतिम मेरिट सूची और चयनित एजेंसी की पात्रता से जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक करने की मांग की जा रही है।

अधिकारी से मांगा गया पक्ष, नहीं मिला जवाब

इस मामले में समग्र शिक्षा के जिला मिशन समन्वयक हरीश गौतम से संपर्क कर उनका पक्ष जानने की कोशिश की गई। उन्होंने दंतेवाड़ा आने पर बात करने की बात कही। इसके बाद प्रतिनिधि उनके कार्यालय भी पहुंचे, लेकिन उनसे बातचीत नहीं हो सकी। लिहाजा, इस मामले में उनका पक्ष सामने नहीं आ पाया है।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आदिवासी युवाओं के भविष्य से जुड़े इस संस्थान के संचालन के लिए एजेंसी का चयन किन वास्तविक मापदंडों पर किया गया? पारदर्शिता के लिए प्रशासन द्वारा पूरी चयन प्रक्रिया और मूल्यांकन रिपोर्ट सार्वजनिक करना जरूरी माना जा रहा है।

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