
सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला: हिरासत में लेने के समय से शुरू होगी 24 घंटे की गिनती, उल्लंघन पर रिहाई का आदेश
नई दिल्ली। पुलिस हिरासत और गिरफ्तारी की प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने के लिए निर्धारित 24 घंटे की समयसीमा उसकी कागजों में दर्ज गिरफ्तारी से नहीं, बल्कि उस समय से शुरू होगी, जब पुलिस वास्तव में उसकी स्वतंत्रता पर रोक लगाती है। यानी पुलिस किसी व्यक्ति को पहले हिरासत में रखकर बाद में उसकी औपचारिक गिरफ्तारी दिखाकर 24 घंटे की समयसीमा को आगे नहीं बढ़ा सकेगी। अदालत ने इस मामले में त्रिपुरा हाईकोर्ट का आदेश रद्द करते हुए चार आरोपियों को जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया है।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला स्वापक औषधि और मन:प्रभावी पदार्थ अधिनियम (एनडीपीएस एक्ट) के तहत दर्ज एक केस से जुड़ा है। इसमें चार आरोपियों ने त्रिपुरा हाईकोर्ट के उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें जमानत देने से इनकार कर दिया गया था।
मामले की सुनवाई जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने की। सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता जिस समय वास्तव में छीनी जाती है, उसी समय से 24 घंटे की संवैधानिक समयसीमा की गणना की जाएगी।
गिरफ्तारी के कागज नहीं, हिरासत का वास्तविक समय होगा आधार
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पुलिस किसी व्यक्ति को पहले अपने नियंत्रण में लेकर पूछताछ या तलाशी की प्रक्रिया पूरी करे और उसके बाद औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज करे, तो ऐसा करके 24 घंटे की समयसीमा को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता।
उदाहरण के तौर पर, यदि पुलिस किसी व्यक्ति को सुबह 8 बजे से हिरासत में रखती है और दोपहर 2 बजे उसकी औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज करती है, तो 24 घंटे की गणना सुबह 8 बजे से ही होगी।
इसका मतलब है कि पुलिस रिकॉर्ड में गिरफ्तारी का समय बदलकर संवैधानिक सुरक्षा से बच नहीं सकती।
संविधान का अनुच्छेद 22(2) क्या कहता है?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 22(2) गिरफ्तार व्यक्ति को महत्वपूर्ण सुरक्षा प्रदान करता है। इसके अनुसार:
- गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर नजदीकी मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनिवार्य है।
- गिरफ्तारी के स्थान से अदालत तक पहुंचने में लगने वाला आवश्यक यात्रा समय इस अवधि में शामिल नहीं होगा।
- मजिस्ट्रेट की अनुमति के बिना 24 घंटे से अधिक हिरासत में नहीं रखा जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि वास्तविक हिरासत शुरू होने के बाद निर्धारित समयसीमा का उल्लंघन होता है, तो आरोपी को तत्काल रिहा किया जाना चाहिए।
सिर्फ 24 घंटे में पेश करना ही काफी नहीं
अदालत ने अपने फैसले में एक और महत्वपूर्ण बात कही है। पुलिस के लिए केवल 24 घंटे के भीतर आरोपी को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि हिरासत की अवधि भी उचित होनी चाहिए।
इसके लिए अदालत ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 58 का उल्लेख किया। इस प्रावधान के अनुसार, बिना वारंट गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को पुलिस परिस्थितियों के अनुसार उचित समय से अधिक हिरासत में नहीं रख सकती। मजिस्ट्रेट के विशेष आदेश के बिना यात्रा के आवश्यक समय को छोड़कर यह अवधि 24 घंटे से अधिक नहीं हो सकती।
अब मजिस्ट्रेट को भी जांचना होगा हिरासत का वास्तविक समय
सुप्रीम कोर्ट ने मजिस्ट्रेट की जिम्मेदारी भी स्पष्ट की है। जब पुलिस किसी आरोपी को अदालत में पेश करेगी, तो मजिस्ट्रेट को यह दर्ज करना होगा कि व्यक्ति की स्वतंत्रता वास्तव में किस तारीख और कितने बजे से सीमित की गई थी।
इसके बाद मजिस्ट्रेट को जांचना होगा कि:
- व्यक्ति को वास्तव में किस समय हिरासत में लिया गया?
- क्या उसे निर्धारित 24 घंटे के भीतर पेश किया गया?
- क्या पुलिस ने औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज करने में अनावश्यक देरी की?
- क्या हिरासत की अवधि परिस्थितियों के हिसाब से उचित थी?
यदि मजिस्ट्रेट को हिरासत की अवधि अनुचित रूप से लंबी लगती है, तो वह आगे पुलिस रिमांड देने से इनकार कर सकता है।
आम लोगों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
इस फैसले का सीधा संबंध नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गिरफ्तारी के दौरान मिलने वाले संवैधानिक अधिकारों से है। अब पुलिस किसी व्यक्ति को कई घंटे हिरासत में रखने के बाद गिरफ्तारी का समय दर्ज करके 24 घंटे की गणना नए सिरे से शुरू नहीं कर सकती।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से गिरफ्तारी की प्रक्रिया में पारदर्शिता और मजिस्ट्रेट की निगरानी की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। यह सुनिश्चित करने की दिशा में अहम कदम है कि किसी भी व्यक्ति की स्वतंत्रता कानून में निर्धारित प्रक्रिया के बिना सीमित न की जाए।












