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बस्तर के मुरिया दरबार में ऐसा क्या बोलीं राष्ट्रपति मुर्मु? जानिए पूरी खबर

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने बस्तर दशहरा के ऐतिहासिक मुरिया दरबार में आदिवासी समाज की पारंपरिक न्याय व्यवस्था की सराहना की। उन्होंने कहा कि मांझी से परगना तक फैली यह व्यवस्था सामाजिक एकता, आपसी सहयोग और सामूहिक निर्णय का उदाहरण है। जहां आधुनिक अदालतों में कई बार मुकदमों के फैसले आने में 10, 20 और 30 साल तक लग जाते हैं, वहीं आदिवासी समाज में स्थानीय स्तर पर बातचीत और सहमति के जरिए कई विवाद सुलझाने की परंपरा रही है।

शुक्रवार, 23 अक्टूबर को जगदलपुर पहुंचीं राष्ट्रपति ने सबसे पहले मां दंतेश्वरी मंदिर में दर्शन किए। इसके बाद वह सिरासार भवन में आयोजित मुरिया दरबार पहुंचीं, जहां उन्होंने मांझी और चालकी समुदाय के पारंपरिक प्रतिनिधियों से बातचीत की। प्रतिनिधियों ने उन्हें मुरिया दरबार के इतिहास, जनजातीय संस्कृति और वनांचल के जीवन से जुड़ी परंपराओं की जानकारी दी।

अपने संबोधन में राष्ट्रपति ने आदिवासी समाज से अपने पारिवारिक जुड़ाव का उल्लेख करते हुए कहा, “मैं भी मांझी की बेटी हूं।” उन्होंने बताया कि मुरिया दरबार जैसी व्यवस्थाएं जमीन से जुड़ी लोकतांत्रिक पद्धतियों का उदाहरण हैं। इन परंपराओं में गांव के विवादों को पहले स्थानीय स्तर पर सुलझाने का प्रयास किया जाता है। सहमति नहीं बनने पर मामला पीड़ परगना और फिर देश परगना तक पहुंच सकता है।

राष्ट्रपति ने बस्तर दशहरा को छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक गौरव और सामूहिक आस्था का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि इस उत्सव में समाज के अलग-अलग वर्गों की भागीदारी इसकी विशेष पहचान है। उन्होंने आदिवासी समाज से अपनी परंपराओं, रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का आह्वान भी किया।

अपने संबोधन में राष्ट्रपति ने नक्सलवाद की चुनौती का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्य सरकार के समन्वित प्रयासों से छत्तीसगढ़ का यह क्षेत्र नक्सली आतंक से मुक्त होकर प्रगति की ओर बढ़ रहा है। उन्होंने शिक्षा और विकास के साथ जनजातीय पहचान तथा सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने पर जोर दिया।

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