बीजों को बचाने की मुहिम में जुटीं वंदना शिवा, औद्योगिक खेती पर क्यों उठाती हैं सवाल?

नई दिल्ली। पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ खेती की वकालत करने वाली भारतीय पर्यावरणविद् और विदुषी डॉ. वंदना शिवा लंबे समय से बीजों की विविधता बचाने, किसानों के अधिकारों और खाद्य संप्रभुता के मुद्दों पर काम कर रही हैं। उनका मानना है कि खेती की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए, जिसमें किसान स्थानीय बीजों को सुरक्षित रख सकें, मिट्टी की सेहत बनी रहे और खाद्य उत्पादन पर कुछ बड़ी कंपनियों का नियंत्रण न बढ़े।
वंदना शिवा अपनी संस्था नवदान्य के माध्यम से पारंपरिक बीजों के संरक्षण और पर्यावरण के अनुकूल कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने के लिए जानी जाती हैं। रासायनिक पदार्थों पर अधिक निर्भर खेती और आनुवंशिक रूप से परिवर्तित फसलों को लेकर उनके विचारों ने दुनिया भर में समर्थन भी पाया है और कई सवाल भी खड़े किए हैं।
पारंपरिक बीजों को बचाने की मुहिम
वंदना शिवा की प्रमुख पहलों में स्थानीय और पारंपरिक बीजों का संरक्षण शामिल है। नवदान्य के माध्यम से बीज संरक्षण केंद्रों और किसानों के साथ मिलकर देशी फसल किस्मों को बचाने पर काम किया जाता है। इस पहल का उद्देश्य ऐसी किस्मों को सुरक्षित रखना है, जो अलग-अलग जलवायु और स्थानीय परिस्थितियों में उगाई जाती रही हैं।
उनकी मुहिम में धान और गेहूं जैसी प्रमुख फसलों की पारंपरिक किस्मों को संरक्षित करने पर भी जोर दिया जाता है। उनका तर्क है कि बीजों की विविधता खेती को अधिक लचीला बनाने और स्थानीय कृषि परंपराओं को बचाए रखने में मदद कर सकती है।
औद्योगिक खेती पर क्यों उठाती हैं सवाल?
वंदना शिवा रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर अत्यधिक निर्भर खेती की आलोचना करती रही हैं। उनका कहना है कि खेती में मिट्टी, पानी, जैव विविधता और किसानों की आजीविका को भी उतना ही महत्व दिया जाना चाहिए, जितना उत्पादन बढ़ाने को दिया जाता है।
वह ऐसी कृषि पद्धतियों का समर्थन करती हैं, जिनमें स्थानीय बीज, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण और खेतों में विविध फसलों को प्राथमिकता मिले। उनके अनुसार, खेती की व्यवस्था पर बड़ी कंपनियों का बढ़ता प्रभाव किसानों की बीज चुनने और उन्हें सुरक्षित रखने की स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकता है।
आनुवंशिक रूप से बदली फसलों पर विवाद
आनुवंशिक रूप से परिवर्तित यानी जीएम फसलों को लेकर वंदना शिवा के विचार लंबे समय से चर्चा और विवाद का विषय रहे हैं। वह इनके संभावित पर्यावरणीय प्रभावों, बीज बाजार पर कंपनियों के नियंत्रण और किसानों की निर्भरता को लेकर सवाल उठाती हैं।
हालांकि, इस विषय पर वैज्ञानिक समुदाय में अलग-अलग विचार मौजूद हैं। जीएम फसलों का मूल्यांकन फसल की किस्म, उसके उपयोग और उपलब्ध वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर किया जाता है। इसलिए सभी जीएम फसलों को एक समान मानना या उनके प्रभावों के बारे में एक ही निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है।
किसान आत्महत्या और कृषि नीति पर भी बहस
वंदना शिवा ने औद्योगिक कृषि व्यवस्था, कर्ज, बीजों की लागत और किसानों की आर्थिक कठिनाइयों को लेकर भी अपनी बात रखी है। हालांकि, किसान आत्महत्या जैसे गंभीर मुद्दे के अनेक और जटिल कारण हैं। इनमें कर्ज, आय की अनिश्चितता, फसल नुकसान, बाजार की स्थिति और स्थानीय सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियां शामिल हो सकती हैं।
इस विषय पर उनके कुछ दावों और व्याख्याओं को अकादमिक तथा वैज्ञानिक हलकों में चुनौती दी गई है। इसलिए कृषि संकट को समझने के लिए विभिन्न अध्ययनों और उपलब्ध आंकड़ों को साथ रखकर देखना जरूरी है।
वैश्विक स्तर पर मिला सम्मान
वंदना शिवा को पर्यावरण संरक्षण, टिकाऊ कृषि और जैव विविधता के क्षेत्र में उनके काम के लिए अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली है। उन्हें वर्ष 1993 में राइट लाइवलीहुड पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। यह पुरस्कार सामाजिक और पर्यावरणीय बदलाव के लिए काम करने वाले लोगों और संगठनों को दिया जाता है।
उनका काम खेती के भविष्य, खाद्य व्यवस्था और बीजों पर किसानों के अधिकारों से जुड़े विमर्श का हिस्सा बना हुआ है। उनके समर्थक उन्हें जैव विविधता और किसानों के अधिकारों की मुखर आवाज मानते हैं, जबकि आलोचक उनके कुछ वैज्ञानिक और कृषि संबंधी दावों पर सवाल उठाते हैं।
खेती के भविष्य पर जारी बहस
वंदना शिवा की मुहिम एक महत्वपूर्ण सवाल उठाती है—कृषि व्यवस्था में उत्पादन बढ़ाने के साथ मिट्टी, पानी, जैव विविधता और किसानों की आजीविका की रक्षा कैसे की जाए? इस सवाल का जवाब खोजने में पारंपरिक ज्ञान, आधुनिक विज्ञान और किसानों के अनुभवों की भूमिका पर लगातार चर्चा हो रही है।
बीज संरक्षण और टिकाऊ खेती की पहलें कृषि के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण विषय हैं। वहीं, जीएम फसलों, कृषि तकनीक और औद्योगिक खेती से जुड़े निष्कर्षों के लिए प्रमाणों और स्वतंत्र वैज्ञानिक मूल्यांकन को महत्व देना भी जरूरी है।












