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चीन का बहिष्कार इतना आसान क्यों नहीं? दवाइयों से लेकर इलेक्ट्रॉनिक्स तक निर्भरता!

चीन से सिर्फ खिलौने और मोबाइल नहीं आते, दवा बनाने का कच्चा माल, इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट, ऑटो पार्ट्स, मशीनरी और सोलर उपकरणों की सप्लाई चेन भी जुड़ी हुई है

भारत और चीन के बीच राजनीतिक, सामरिक और आर्थिक मतभेदों के बीच अक्सर चीन के सामान के बहिष्कार की आवाज उठती है। मोबाइल से लेकर खिलौने, इलेक्ट्रॉनिक्स और दूसरे उत्पादों को लेकर लोगों के बीच भी यह सवाल उठता है कि आखिर चीन पर निर्भरता कितनी है?पहली नजर में जवाब आसान लगता है—चीनी सामान खरीदना बंद कर दिया जाए और भारतीय सामान इस्तेमाल किया जाए।लेकिन असली तस्वीर इससे कहीं ज्यादा जटिल है।क्योंकि भारत चीन से केवल तैयार उत्पाद नहीं खरीदता। चीन भारत की कई औद्योगिक सप्लाई चेन में कच्चे माल, APIs, इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट, मशीनरी, ऑटो पार्ट्स, सोलर उपकरण और दूसरे intermediate goods के स्रोत के रूप में जुड़ा हुआ है।यानी चीन से निर्भरता का सवाल सिर्फ यह नहीं है कि बाजार में रखा कोई सामान “Made in China” है या नहीं। असली सवाल यह है कि भारत में बनने वाले सामान के पीछे कौन-सा कच्चा माल और कौन-सा कंपोनेंट कहां से आ रहा है?


सबसे पहले दवाइयों की बात: भारत दवा बनाता है, लेकिन हर कच्चा माल भारत में नहीं बनता

भारत को दुनिया के बड़े जेनेरिक दवा उत्पादकों में गिना जाता है। देश में Sun Pharma, Dr. Reddy’s Laboratories, Cipla, Lupin, Aurobindo Pharma, Zydus Lifesciences, Torrent Pharmaceuticals, Alkem Laboratories जैसी बड़ी कंपनियां दवाएं बनाती हैं।लेकिन दवा बनाने के लिए केवल फार्मा फैक्ट्री और टैबलेट मशीन पर्याप्त नहीं होती।इसके लिए API यानी Active Pharmaceutical Ingredients, Key Starting Materials और Drug Intermediates की जरूरत होती है।वाणिज्य मंत्रालय की 2024-25 की रिपोर्ट साफ बताती है कि भारत घरेलू जरूरत और formulations के निर्माण के लिए APIs, KSMs और Drug Intermediates के आयात पर काफी निर्भर है। सरकार ने इस निर्भरता को कम करने के लिए घरेलू API उत्पादन बढ़ाने की दिशा में भी कदम उठाए हैं।यही वह हिस्सा है जहां चीन की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।पुराने सरकारी आंकड़ों में bulk drugs/API imports में चीन की हिस्सेदारी काफी ऊंची रही है। उदाहरण के लिए 2015-16 में भारत के bulk drug imports का लगभग 64.81 प्रतिशत चीन से आया था। यह पुराना आंकड़ा है और इसे 2026 की वर्तमान हिस्सेदारी नहीं माना जाना चाहिए, लेकिन यह बताता है कि भारत की फार्मा सप्लाई चेन में चीन पर निर्भरता कोई नई समस्या नहीं है।

यानी असर कहां पड़ सकता है?

अगर किसी महत्वपूर्ण API या intermediate की सप्लाई बाधित होती है तो समस्या केवल चीन से आने वाली तैयार दवा की नहीं होगी।भारतीय कंपनियां भारत में दवा बना सकती हैं, लेकिन अगर किसी विशेष formulation के लिए जरूरी input की supply chain प्रभावित होती है तो production cost, availability और delivery पर असर पड़ सकता है।इसीलिए Sun Pharma, Cipla, Dr. Reddy’s, Lupin, Aurobindo Pharma, Zydus और दूसरी भारतीय फार्मा कंपनियों की तरह पूरे सेक्टर के लिए API और KSM की घरेलू उपलब्धता महत्वपूर्ण है।


मोबाइल फोन: फोन भारत में बनता है, लेकिन अंदर का हर पार्ट भारत का नहीं

अब मोबाइल की बात करें।

भारत में Apple, Samsung, Xiaomi, Vivo, Oppo, Realme, Motorola जैसी कंपनियों के फोन और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों का बड़ा बाजार है। साथ ही भारत में मोबाइल निर्माण और assembly का ecosystem भी तेजी से बढ़ा है।लेकिन किसी स्मार्टफोन को बनाने के लिए सिर्फ उसकी assembly पर्याप्त नहीं है।इसके अंदर—डिस्प्ले,कैमरा मॉड्यूल,PCB,semiconductor components,memory,छोटे electronic components जैसे सैकड़ों हिस्से लगते हैं।इनमें से कई components की global supply chain चीन और पूर्वी एशिया से जुड़ी हुई है।इसलिए “भारत में फोन बन रहा है” और “फोन के हर component का निर्माण भारत में हो रहा है” — दोनों बातें एक जैसी नहीं हैं।भारत की चुनौती यही है कि assembly से आगे बढ़कर component manufacturing का ecosystem भी मजबूत किया जाए।


Apple और Samsung जैसे बड़े नाम, लेकिन सप्लाई चेन वैश्विक

भारत में Apple के iPhone का manufacturing ecosystem विकसित हुआ है। Foxconn और Tata Electronics जैसे manufacturing partners भी भारत में उत्पादन कर रहे हैं।Samsung का भी भारत में बड़ा manufacturing base है।लेकिन इन कंपनियों का global supply chain network कई देशों में फैला हुआ है। किसी भी बड़े electronic product में अलग-अलग देशों से components और raw materials आ सकते हैं।यानी भारत में अंतिम assembly बढ़ना महत्वपूर्ण है, लेकिन component ecosystem विकसित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।


ऑटोमोबाइल: कार भारतीय कंपनी की हो सकती है, लेकिन उसके अंदर कई देशों के पार्ट्स हो सकते हैं

अब कार और बाइक की बात करें।भारत में Maruti Suzuki, Tata Motors, Mahindra & Mahindra, Hyundai Motor India, Kia India, Toyota Kirloskar, Bajaj Auto, TVS Motor, Hero MotoCorp जैसी कंपनियां बड़ा उत्पादन करती हैं।

लेकिन आधुनिक वाहन केवल लोहे और इंजन से नहीं बनता।

आज की कार में—

  • semiconductor
  • sensors
  • electronic control units
  • fuel injection systems
  • turbochargers
  • transmission components
  • compressors
  • thermal management systems
  • electrical components

जैसे अनेक high-tech parts होते हैं।

Automotive Component Manufacturers Association यानी ACMA के अनुसार FY2024 में चीन भारत के auto-component imports का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा था।ACMA की बाद की रिपोर्ट में भी electronics, semiconductors, sensors, turbochargers, injectors, advanced transmission systems और cooling systems को ऐसे क्षेत्रों में गिना गया है जहां import dependence महत्वपूर्ण है।यानी चीन से निर्भरता खत्म करने का मतलब केवल चीनी कार खरीदना बंद करना नहीं है।भारतीय कार के अंदर लगने वाले हर महत्वपूर्ण component की वैकल्पिक supply chain तैयार करना भी जरूरी है।


EV और बैटरी: असली चुनौती यहां और बड़ी हो सकती है

इलेक्ट्रिक वाहन आने वाले समय में ऑटो सेक्टर को बदल रहे हैं।

भारत में Tata Motors, Mahindra, MG Motor India, Hyundai, Kia, Ola Electric, Ather Energy, TVS Motor, Bajaj Auto समेत कई कंपनियां EV क्षेत्र में काम कर रही हैं।लेकिन EV का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है—battery और उसके components।Battery ecosystem में lithium-ion cells, cathode materials, anode materials, separators, electrolytes और battery-management electronics जैसे कई components होते हैं।चीन ने battery supply chain के कई हिस्सों में मजबूत manufacturing capacity विकसित की है।इसलिए भारत के लिए EV manufacturing बढ़ाने के साथ-साथ battery cell manufacturing और critical materials की supply chain को भी मजबूत करना रणनीतिक विषय है।


सोलर पैनल: आत्मनिर्भरता की कोशिश, लेकिन supply chain अभी भी बड़ी चुनौती

भारत ने renewable energy और solar power को तेजी से बढ़ाने का लक्ष्य रखा है।इस क्षेत्र में Adani Solar, Waaree Energies, Vikram Solar, Tata Power Solar, Premier Energies जैसी भारतीय कंपनियां महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

लेकिन solar manufacturing में भी केवल अंतिम panel बनाना पर्याप्त नहीं है।

पूरी chain में—

Polysilicon → Wafer → Cell → Module

MNRE स्वयं solar PV क्षेत्र में wafers, cells और modules के लिए import dependence को एक technology gap के रूप में दर्ज करता है।सरकार ने domestic solar manufacturing को बढ़ाने के लिए ₹24,000 करोड़ के PLI programme को भी लागू किया है, जिसका उद्देश्य high-efficiency solar PV modules का घरेलू manufacturing ecosystem बनाना और import dependence कम करना है।इसका मतलब साफ है—भारत चीन या किसी एक देश पर निर्भरता कम करना चाहता है, लेकिन इसके लिए पूरी manufacturing chain को भारत में मजबूत करना होगा।


मशीनरी और industrial equipment: यहां भी चीन की भूमिका

भारत का manufacturing sector जितना बड़ा होगा, उतनी ही ज्यादा मशीनों की जरूरत होगी।

फैक्ट्री में इस्तेमाल होने वाली—

  • CNC machines
  • industrial equipment
  • electrical machinery
  • automation components
  • motors
  • controllers
  • sensors
  • industrial electronics

जैसी चीजें manufacturing ecosystem का आधार हैं।

भारत में Larsen & Toubro, Siemens India, ABB India, Bharat Electronics, BHEL जैसी कंपनियां industrial और engineering ecosystem में काम करती हैं।लेकिन global industrial supply chain में कई मशीनरी और components अलग-अलग देशों से आते हैं।इसलिए चीन से import घटाने का अर्थ यह भी है कि भारत को industrial machinery और precision components में अपनी क्षमता बढ़ानी होगी।


इलेक्ट्रॉनिक्स सिर्फ मोबाइल तक सीमित नहीं

आज टीवी, refrigerator, washing machine, AC, router, CCTV, computer, printer, LED lighting और industrial electronics—लगभग हर क्षेत्र में electronic components की जरूरत है।भारत में LG Electronics India, Samsung India, Dixon Technologies, Amber Enterprises, Havells, Voltas, Blue Star जैसी कंपनियां electronics और consumer durable ecosystem में मौजूद हैं।लेकिन इन उत्पादों की global supply chain में semiconductor, PCB, sensors, controllers और दूसरे components कई देशों से आते हैं।यही कारण है कि भारत के लिए electronics manufacturing की अगली चुनौती केवल assembly नहीं बल्कि component manufacturing है।


LED और छोटे इलेक्ट्रॉनिक सामान

एक छोटा सा bulb दिखाई देता है, लेकिन उसके अंदर LED chip, driver, PCB और अन्य electronic components होते हैं।भारत में Havells, Bajaj Electricals, Polycab, Wipro Lighting, Syska जैसी कंपनियां lighting और electrical products के बाजार में मौजूद हैं।अगर भारत को इस क्षेत्र में पूरी तरह आत्मनिर्भर होना है तो केवल final product नहीं बल्कि chip, driver, electronic components और raw materials की घरेलू क्षमता भी बढ़ानी होगी।


रसायन और industrial raw material

केमिकल इंडस्ट्री भी इस कहानी का बड़ा हिस्सा है।

भारत में Reliance Industries, SRF, Atul, Gujarat Fluorochemicals, Deepak Nitrite, Aarti Industries जैसी कंपनियां chemical और industrial manufacturing में काम करती हैं।

लेकिन chemical industry की supply chain भी वैश्विक है।

कई specialty chemicals, intermediates और industrial raw materials विभिन्न देशों से आते हैं।

इसलिए चीन से import dependence को कम करना chemical industry में भी alternative suppliers और domestic production विकसित करने का सवाल है।


भारत का सबसे बड़ा सवाल: चीन को छोड़ना या dependence कम करना?

यहीं पूरी बहस का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा सामने आता है।चीन से पूरी तरह व्यापार समाप्त कर देना और चीन पर निर्भरता कम करना—ये दोनों अलग-अलग बातें हैं।एक तरफ भारत को strategic sectors में अपनी manufacturing क्षमता बढ़ानी है।दूसरी तरफ अचानक supply बंद होने से भारतीय उद्योगों में production cost और availability की समस्या पैदा हो सकती है।सरकार खुद supply-chain diversification और alternative suppliers तलाशने की जरूरत पर जोर देती रही है। वाणिज्य मंत्रालय ने भी कंपनियों को alternative suppliers तलाशने और single-source dependency कम करने की दिशा में प्रोत्साहित करने की बात कही है।


तो क्या भारत चीन पर निर्भरता खत्म नहीं कर सकता?

ऐसा कहना भी सही नहीं होगा।भारत कई क्षेत्रों में अपनी manufacturing क्षमता बढ़ा रहा है।Solar manufacturing के लिए PLI योजना है।Pharma में API और bulk-drug production बढ़ाने की कोशिश हो रही है।Electronics में domestic manufacturing ecosystem विकसित किया जा रहा है।Auto-component sector में localization बढ़ाने पर जोर है।लेकिन यह बदलाव एक दिन या एक साल में नहीं होगा।इसके लिए factories, skilled manpower, technology, R&D, raw materials, capital और global supply-chain alternatives की जरूरत होगी।


अगर चीन से सप्लाई अचानक रुक जाए तो क्या होगा?

यह एक काल्पनिक स्थिति है, लेकिन इससे निर्भरता को समझना आसान होता है।

दवाइयां

API और intermediates की supply प्रभावित होने पर कुछ medicines के production cost और availability पर दबाव आ सकता है।

मोबाइल और electronics

कुछ components और sub-components की supply chain प्रभावित हो सकती है।

ऑटोमोबाइल

Semiconductors, sensors, electronics और कुछ critical components की उपलब्धता पर असर पड़ सकता है।

EV

Battery cells और battery materials की supply chain चुनौती बन सकती है।

Solar

Cells, wafers और दूसरे components की availability और cost प्रभावित हो सकती है।

मशीनरी

Manufacturing plants में इस्तेमाल होने वाले कुछ equipment और spare components के लिए alternative suppliers तलाशने पड़ सकते हैं।

Consumer products

AC, TV, refrigerator, lighting और दूसरे products की component supply प्रभावित हो सकती है।


सबसे बड़ा सबक: “Made in India” से आगे बढ़ना होगा

भारत के लिए असली आत्मनिर्भरता का मतलब केवल यह नहीं है कि अंतिम उत्पाद पर Made in India लिखा हो।

असली सवाल है—

उस उत्पाद के अंदर लगने वाला raw material कहां से आया?

उसकी मशीन किस देश की है?

उसका electronic chip कहां बना?

उसकी battery में इस्तेमाल होने वाला material कहां से आया?

उसकी दवा का API कहां बना?

और सबसे महत्वपूर्ण—

अगर एक देश से supply बंद हो जाए तो क्या भारत के पास दूसरा विकल्प मौजूद है?

यही कारण है कि चीन से निर्भरता कम करने की चुनौती केवल व्यापार की नहीं, बल्कि भारत की industrial security और supply-chain security की भी है।


चीन का बहिष्कार नहीं, पहले मजबूत विकल्प

भारत में चीनी सामान का बहिष्कार करना उपभोक्ता स्तर पर एक अलग चर्चा हो सकती है। लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर चीन पर आर्थिक निर्भरता घटाना कहीं बड़ा काम है।

इसके लिए भारत को—

दवा का API खुद बनाना होगा,
मोबाइल के components खुद बनाने होंगे,
ऑटो के critical parts की manufacturing बढ़ानी होगी,
battery ecosystem तैयार करना होगा,
solar की पूरी value chain विकसित करनी होगी,
industrial machinery में क्षमता बढ़ानी होगी
और एक से ज्यादा देशों से भरोसेमंद supply chain तैयार करनी होगी।
यानी असली लक्ष्य केवल “China छोड़ो” नहीं बल्कि “China के विकल्प तैयार करो” होना चाहिए।क्योंकि जब तक विकल्प मजबूत नहीं होंगे, तब तक सिर्फ अंतिम उत्पाद का बहिष्कार करने से पूरी निर्भरता खत्म नहीं होगी।और यही इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा सवाल है—

भारत चीन से कितना सामान खरीदता है, यह महत्वपूर्ण है; लेकिन उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि भारत चीन से किन-किन चीजों के लिए मजबूर होकर जुड़ा हुआ है।

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