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भोजपुरी गीत में जापानी शमिसेन का तड़का, ‘चम्पवा की कलियां’ ने सोशल मीडिया पर मचाई धूम

पूर्वांचल के पारंपरिक लोकगीत में जापानी संगीत वाद्य का अनोखा मेल, विरह की कहानी और धोबिया नृत्य ने खींचा लोगों का ध्यान

भोजपुरी लोकसंगीत की गूंज अब सोशल मीडिया के जरिए एक अलग अंदाज में लोगों तक पहुंच रही है। इन दिनों पूर्वांचल के पारंपरिक गीत ‘चम्पवा की कलियां’ की चर्चा हो रही है। इस गीत की खासियत इसका ठेठ भोजपुरी अंदाज ही नहीं, बल्कि इसमें सुनाई देने वाला जापानी शमिसेन वाद्य यंत्र का संगीत भी है।

पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के भोजपुरी भाषी क्षेत्रों की लोक परंपरा से जुड़े इस गीत में भारतीय लोकधुन और जापानी पारंपरिक संगीत का मेल सुनने को मिलता है। यही अनोखा संयोजन इसे सोशल मीडिया पर चर्चा में ला रहा है।

जापानी शमिसेन ने बदला गीत का अंदाज

‘चम्पवा की कलियां’ में शमिसेन नाम के पारंपरिक जापानी वाद्य यंत्र का इस्तेमाल किया गया है। यह तीन तारों वाला वाद्य है, जिसे बड़े प्लैक्ट्रम की मदद से बजाया जाता है। इसकी आवाज तीखी और गतिशील होती है, जो भोजपुरी लोकधुन के साथ मिलकर गीत को अलग संगीतात्मक अंदाज देती है।

इस गीत में पूर्वांचल की लोक संस्कृति और जापानी संगीत परंपरा का यह मेल यह दिखाता है कि लोकसंगीत अलग-अलग संस्कृतियों के बीच किस तरह संवाद स्थापित कर सकता है।

जश्न जैसा लगता है, लेकिन कहानी विरह की

पहली बार सुनने पर गीत का अंदाज किसी उत्सव या जश्न से जुड़ा हुआ लग सकता है, लेकिन इसके बोलों में विरह और बिछोह की कहानी छिपी है।

गीत की पंक्ति “बाटो जोहे नदियां, काहे आये न पतवार…” में नायिका अपने प्रिय की प्रतीक्षा करती दिखाई देती है। वह नदी और किनारे के प्रतीक के जरिए अपने इंतजार और अकेलेपन को व्यक्त करती है।

इसके बाद “पिया चल गइले कलकत्ता, संग ले गइलन बहार…” के जरिए वह अपने प्रिय के कलकत्ता चले जाने और अपने साथ जीवन की खुशियां भी ले जाने की शिकायत करती है।

चम्पा की कली और प्रिय की याद

गीत में चम्पा की कली से बनी कंघी का भी जिक्र आता है। नायिका अपने बाल संवारते हुए अपने प्रिय को याद करती है। लोकगीत की यही सरल भाषा और भावनात्मक प्रस्तुति इसे पूर्वांचल की पारंपरिक लोकसंस्कृति से जोड़ती है।

original वीडियो सोर्स 

गीत में दिखी धोबिया नृत्य की झलक

‘चम्पवा की कलियां’ की प्रस्तुति में सिर्फ लोकगीत ही नहीं, बल्कि धोबिया नृत्य की झलक भी दिखाई देती है। यह पूर्वांचल की पारंपरिक लोकनृत्य शैली है, जिसका संबंध खासतौर पर आजमगढ़, जौनपुर और गाजीपुर जैसे क्षेत्रों से बताया जाता है।

एक दौर में इस तरह के लोकनृत्य शादी-ब्याह, त्योहार और दूसरे शुभ अवसरों पर किए जाते थे। गीत में इस नृत्य की मौजूदगी इसकी क्षेत्रीय लोक-सांस्कृतिक पहचान को और मजबूत करती है।

लोकगीत और दुनिया के संगीत का अनोखा संगम

‘चम्पवा की कलियां’ की खासियत इसकी कहानी, भोजपुरी लोकधुन, पारंपरिक नृत्य और जापानी शमिसेन के संयोजन में है। पूर्वांचल की मिट्टी से जुड़े इस लोकगीत में जापानी वाद्य की आवाज का जुड़ना इसे सोशल मीडिया पर एक अलग पहचान दे रहा है।

 

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