HealthLatest

नई रिसर्च ने प्रोबायोटिक्स को लेकर बदली सोच, हर इंसान के लिए एक जैसे नहीं होते ‘गुड बैक्टीरिया’

नई दिल्ली। गट हेल्थ यानी आंतों की सेहत को लेकर लंबे समय से माना जाता रहा है कि प्रोबायोटिक्स में मौजूद ‘गुड बैक्टीरिया’ हर व्यक्ति के लिए लगभग समान तरीके से काम करते हैं। लेकिन भारतीय वैज्ञानिकों और अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं की एक नई स्टडी ने इस धारणा पर सवाल खड़े किए हैं। शोध में संकेत मिला है कि इंसान की आंत में मौजूद माइक्रोबायोम उसके खान-पान, जीवनशैली और स्थानीय वातावरण से गहराई से प्रभावित होता है।

इसका मतलब यह है कि किसी एक देश या आबादी के लोगों पर प्रभावी साबित हुआ प्रोबायोटिक हर दूसरे व्यक्ति के लिए उतना ही प्रभावी हो, यह जरूरी नहीं है।

भारतीय जनजातीय समुदायों में मिले खास बैक्टीरिया

पुणे स्थित नेशनल सेंटर फॉर सेल साइंस (NCCS) और स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी से जुड़े वैज्ञानिकों ने भारत के विभिन्न जनजातीय समुदायों के आंतों के माइक्रोबायोम का अध्ययन किया। शोध के दौरान ऐसे कई बैक्टीरिया और उनके स्ट्रेन सामने आए, जो पश्चिमी आबादी में कम देखने को मिलते हैं।

शोधकर्ताओं ने पाया कि लंबे समय से पारंपरिक खान-पान अपनाने वाले समुदायों के आंतों के बैक्टीरिया भी उसी भोजन के अनुरूप विकसित होते हैं। इससे यह समझने में मदद मिलती है कि भोजन और गट माइक्रोबायोम के बीच कितना गहरा संबंध है।

दाल-रोटी से लेकर डेयरी तक, भोजन का असर

हमारे शरीर में मौजूद माइक्रोबायोम केवल जन्म से तय नहीं होता। खान-पान भी इसे लगातार प्रभावित करता है। भारतीय भोजन में साबुत अनाज, दालें, सब्जियां, फाइबर और पारंपरिक डेयरी उत्पादों का इस्तेमाल लंबे समय से होता रहा है।

शोध में कुछ ऐसे बैक्टीरिया भी मिले जिनमें जौ और गेहूं जैसे अनाज तथा पारंपरिक डेयरी उत्पादों से मिलने वाले पोषक तत्वों को प्रोसेस करने की क्षमता दिखाई दी।

यानी पीढ़ियों से खाया जा रहा भोजन सिर्फ शरीर को पोषण देने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आंत में रहने वाले सूक्ष्मजीवों के समुदाय को भी आकार दे सकता है।

क्या विदेशी प्रोबायोटिक्स भारतीयों के लिए बेअसर हैं?

रिसर्च का यह मतलब नहीं है कि विदेशों में विकसित सभी प्रोबायोटिक्स भारतीय लोगों के लिए बेअसर हैं। हालांकि, इससे यह सवाल जरूर उठता है कि किसी व्यक्ति के लिए प्रोबायोटिक चुनते समय उसकी आबादी, खान-पान और व्यक्तिगत गट माइक्रोबायोम को भी ध्यान में रखना चाहिए।

बाजार में उपलब्ध कई प्रोबायोटिक उत्पादों में ऐसे बैक्टीरियल स्ट्रेन होते हैं जिन पर अलग-अलग आबादी में शोध किया गया है। इसलिए किसी एक व्यक्ति में फायदा देने वाला स्ट्रेन दूसरे व्यक्ति में बिल्कुल समान परिणाम दे, यह जरूरी नहीं।

पारंपरिक भोजन क्यों हो सकता है मददगार?

विशेषज्ञों के अनुसार, गट हेल्थ के लिए केवल प्रोबायोटिक सप्लीमेंट पर निर्भर रहने के बजाय रोजमर्रा के भोजन पर भी ध्यान देना जरूरी है। फाइबर से भरपूर फल, सब्जियां, साबुत अनाज और दालें आंत के माइक्रोबायोम के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

दही और कुछ अन्य पारंपरिक फर्मेंटेड खाद्य पदार्थ भी आहार का हिस्सा हो सकते हैं, हालांकि हर व्यक्ति की जरूरत और सहनशीलता अलग होती है।

प्रोबायोटिक लेने से पहले रखें ध्यान

नई रिसर्च का संदेश यह नहीं है कि प्रोबायोटिक्स खराब हैं या उन्हें लेना बंद कर देना चाहिए। बल्कि यह संकेत मिलता है कि ‘एक ही प्रोबायोटिक सबके लिए’ वाली सोच को अधिक सावधानी से देखने की जरूरत है।

अगर किसी व्यक्ति को लगातार गैस, पेट फूलना, कब्ज, दस्त या अन्य पाचन संबंधी समस्या रहती है तो केवल विज्ञापन देखकर प्रोबायोटिक सप्लीमेंट शुरू करने के बजाय डॉक्टर या योग्य स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर है।

गट हेल्थ का भविष्य स्थानीय माइक्रोबायोम से जुड़ सकता है

इस तरह की रिसर्च भविष्य में ऐसे प्रोबायोटिक्स विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण हो सकती है जो किसी खास आबादी के खान-पान और आंतों में मौजूद माइक्रोबायोम के अनुरूप तैयार किए जाएं।

भारतीय आबादी के लिए भारतीय भोजन और स्थानीय माइक्रोबायोम को ध्यान में रखकर प्रोबायोटिक या प्रीबायोटिक उत्पाद विकसित करने पर आगे और शोध की जरूरत है। फिलहाल इस अध्ययन से एक बात जरूर सामने आती है कि गट हेल्थ का कोई एक फॉर्मूला सभी लोगों पर समान रूप से लागू नहीं किया जा सकता।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button