chhattisgarhFeatureLatest

रेगिस्तान में फिर उग रहा जंगल, जोधपुर में मरुवन से बंजर जमीन को हरा-भरा करने की पहल

मियावाकी तकनीक और देशी पेड़-पौधों की मदद से मरुस्थलीकरण रोकने की कोशिश, स्थानीय लोगों की भागीदारी से तैयार हो रहा जैव-विविधता वाला क्षेत्र

जोधपुर। राजस्थान के सूखे और रेतीले इलाके में अब हरियाली की नई उम्मीद दिखाई दे रही है। जोधपुर में मरुस्थलीकरण की बढ़ती समस्या से निपटने और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को फिर से मजबूत करने के लिए मरुवन बसाने की पहल की जा रही है।

गौरव गुर्जर और वर्षा गुर्जर स्थानीय लोगों के साथ मिलकर इस अभियान को आगे बढ़ा रहे हैं। उनका उद्देश्य ऐसी जमीन पर दोबारा वन क्षेत्र विकसित करना है, जहां लंबे समय से हरियाली बेहद सीमित रही है।

मियावाकी तकनीक से तैयार हो रहा जंगल

इस परियोजना में मियावाकी प्लांटेशन तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। इस पद्धति में कम जगह में विभिन्न प्रजातियों के पौधे अपेक्षाकृत घने तरीके से लगाए जाते हैं, जिससे पौधों के विकास और स्थानीय सूक्ष्म पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा मिल सकता है।

इस पहल में विदेशी प्रजातियों के बजाय क्षेत्र के अनुकूल देशी पेड़-पौधों को प्राथमिकता दी जा रही है। इससे भविष्य में स्थानीय पक्षियों, कीटों और अन्य जीव-जंतुओं के लिए अनुकूल वातावरण तैयार होने की उम्मीद है।

स्थानीय लोगों की भागीदारी बनी ताकत

मरुवन को विकसित करने की इस कोशिश में स्थानीय समुदाय भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। पौधरोपण से लेकर उनकी देखभाल तक स्थानीय लोग अभियान से जुड़े हुए हैं।

शुरुआती चरण में लगाए गए पौधों के बेहतर परिणाम दिखाई देने लगे हैं। इससे परियोजना से जुड़े लोगों का उत्साह बढ़ा है और रेतीले क्षेत्र में एक नए हरित क्षेत्र के विकसित होने की उम्मीद मजबूत हुई है।

मरुस्थलीकरण से मुकाबले की कोशिश

राजस्थान के कई हिस्सों में कम वर्षा, बढ़ती गर्मी और सीमित वनस्पति के कारण मरुस्थलीकरण एक गंभीर पर्यावरणीय चुनौती है। ऐसे में स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल पौधों के जरिए वन क्षेत्र विकसित करने की पहल पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।

मरुवन परियोजना का लक्ष्य सिर्फ पेड़ लगाना नहीं, बल्कि समय के साथ जैव-विविधता से भरपूर एक प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र तैयार करना है। यदि यह प्रयोग सफल रहता है, तो सूखे और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में इसी तरह की पहल के लिए यह एक उदाहरण बन सकता है।

रेतीली जमीन के बीच उगती नई हरियाली फिलहाल इस बात की उम्मीद जगा रही है कि सामूहिक प्रयास और वैज्ञानिक तरीके अपनाकर मरुस्थलीकरण के प्रभावों को कम करने की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button