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9/11: 25 साल पहले अमेरिका को दहला देने वाला आतंकी हमला, वर्ल्ड ट्रेड सेंटर और पेंटागन बने थे निशाना

11 सितंबर 2001 को अल-कायदा के आतंकियों ने चार यात्री विमानों का अपहरण कर अमेरिका पर हमला किया, जिसमें करीब 3,000 लोगों की जान चली गई।

 

नई दिल्ली। 11 सितंबर 2001 का दिन अमेरिका ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के इतिहास में सबसे भयावह आतंकी घटनाओं में दर्ज है। इसी दिन आतंकवादी संगठन अल-कायदा से जुड़े हमलावरों ने चार यात्री विमानों का अपहरण कर अमेरिका के महत्वपूर्ण ठिकानों को निशाना बनाया था।

दो विमानों को न्यूयॉर्क स्थित वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की ट्विन टावर्स से टकराया गया। टक्कर के बाद दोनों इमारतों में भीषण आग लग गई और कुछ समय बाद दोनों गगनचुंबी इमारतें ढह गईं। तीसरे विमान को अमेरिका के रक्षा मंत्रालय के मुख्यालय पेंटागन से टकराया गया।

चौथा विमान यूनाइटेड एयरलाइंस फ्लाइट 93 था। यात्रियों और चालक दल के सदस्यों ने विमान पर नियंत्रण वापस लेने की कोशिश की। विमान पेंसिल्वेनिया में दुर्घटनाग्रस्त हो गया और अपने निर्धारित लक्ष्य तक नहीं पहुंच सका।

इस हमले में करीब 3,000 लोगों की मौत हुई। मृतकों में अलग-अलग देशों के नागरिक शामिल थे। हमले के बाद अमेरिका की सुरक्षा और विदेश नीति में बड़े बदलाव हुए और आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक अभियान तेज हुआ।

11 सितंबर की घटना ने बदली दुनिया

9/11 हमले के बाद अमेरिका ने आतंकवाद के खिलाफ व्यापक सैन्य और सुरक्षा अभियान शुरू किया। इसके दूरगामी प्रभाव पूरी दुनिया की राजनीति, अंतरराष्ट्रीय संबंधों, हवाई यात्रा की सुरक्षा और आतंकवाद विरोधी नीतियों पर पड़े।

 

आतंकवाद के खिलाफ शुरू हुआ व्यापक अभियान

9/11 हमलों के बाद तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने आतंकवाद के खिलाफ व्यापक अंतरराष्ट्रीय अभियान शुरू करने की घोषणा की। इसे ‘ग्लोबल वॉर ऑन टेरर’ के नाम से जाना गया।

अमेरिका की रणनीति में आतंकी संगठनों के ठिकानों पर सैन्य कार्रवाई के साथ उनकी आर्थिक गतिविधियों पर रोक लगाना और उन्हें सुरक्षित पनाहगाह मिलने से रोकना भी शामिल था।

20 सितंबर 2001 को बुश ने तालिबान से अल-कायदा के नेताओं और सदस्यों को पनाह देना बंद करने की मांग की। इसके कुछ ही दिनों बाद आतंकवादी संगठनों तथा उनसे जुड़े वित्तीय नेटवर्क पर कार्रवाई शुरू कर दी गई।

अफगानिस्तान में सैन्य अभियान

7 अक्टूबर 2001 को अमेरिका ने अफगानिस्तान में सैन्य अभियान शुरू किया। शुरुआती कार्रवाई में अल-कायदा के प्रशिक्षण शिविरों और तालिबान से जुड़े सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया।

अमेरिका ने आतंकवाद के खिलाफ अभियान के साथ अफगानिस्तान में मानवीय सहायता उपलब्ध कराने की भी बात कही।

इराक में भी शुरू हुआ युद्ध

इसके बाद अमेरिका का ध्यान इराक की ओर गया। अमेरिकी प्रशासन ने तत्कालीन इराकी राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन की सरकार पर आतंकवाद से संबंध और बड़े पैमाने पर विनाशकारी हथियार रखने के आरोप लगाए।

19 मार्च 2003 को अमेरिका ने इराक में सैन्य अभियान शुरू किया। इसका प्रमुख उद्देश्य सद्दाम हुसैन की सरकार को सत्ता से हटाना था।

होमलैंड सिक्योरिटी विभाग का गठन

9/11 के बाद अमेरिका ने अपनी घरेलू सुरक्षा व्यवस्था में सबसे बड़ा संस्थागत बदलाव किया। होमलैंड सिक्योरिटी विभाग यानी DHS की स्थापना होमलैंड सिक्योरिटी एक्ट के तहत 25 नवंबर 2002 को हुई और मार्च 2003 में इसने काम शुरू किया।

इस विभाग के गठन का उद्देश्य आतंकवाद सहित दूसरे राष्ट्रीय सुरक्षा खतरों से निपटने के लिए विभिन्न सरकारी एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करना था।

करीब 22 एजेंसियों और कार्यालयों को एक नई कैबिनेट स्तर की व्यवस्था के तहत जोड़ा गया। टॉम रिज इसके पहले सचिव बने।

हालांकि विभाग को शुरुआती वर्षों में नौकरशाही और एजेंसियों के बीच समन्वय जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। 2005 में आए तूफान कैटरीना के दौरान इसकी आपदा प्रबंधन क्षमता पर भी सवाल उठे। निगरानी और नागरिक अधिकारों को लेकर भी बहस जारी रही।

पेट्रियट एक्ट ने जांच एजेंसियों को दिए ज्यादा अधिकार

9/11 के बाद अमेरिका ने USA PATRIOT Act लागू किया। 26 अक्टूबर 2001 को लागू हुए इस कानून का उद्देश्य आतंकवाद से जुड़े मामलों की जांच और संभावित आतंकी साजिशों को रोकने के लिए सरकारी एजेंसियों की क्षमता बढ़ाना था।

कानून के तहत खुफिया जानकारी जुटाने और संदिग्ध गतिविधियों की निगरानी के लिए कई प्रावधान किए गए। अलग-अलग जांच और खुफिया एजेंसियों के बीच सूचना साझा करने की प्रक्रिया को भी आसान बनाया गया।

आतंकवाद की फंडिंग और मनी लॉन्ड्रिंग पर रोक लगाने के लिए वित्तीय निगरानी को मजबूत किया गया। आतंकवादियों को आर्थिक सहायता या अन्य प्रकार की मदद उपलब्ध कराने वालों के खिलाफ कार्रवाई के प्रावधान भी किए गए।

हालांकि, इस कानून के कुछ प्रावधानों को लेकर नागरिक स्वतंत्रता और निजता के अधिकार पर बहस भी हुई।

एयरपोर्ट और विमान सुरक्षा में बड़ा बदलाव

9/11 के बाद अमेरिका ने विमानन सुरक्षा को पूरी तरह नए स्तर पर ले जाने की कोशिश की।

19 नवंबर 2001 को Transportation Security Administration यानी TSA की स्थापना के लिए कानून बनाया गया। इसके बाद एयरपोर्ट सुरक्षा जांच को संघीय स्तर पर मजबूत किया गया।

यात्रियों और उनके सामान की स्क्रीनिंग, प्रतिबंधित वस्तुओं की पहचान तथा एयरपोर्ट सुरक्षा व्यवस्था में TSA की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई।

चेक-इन किए गए सामान की व्यापक स्क्रीनिंग शुरू की गई। विस्फोटक और हथियारों का पता लगाने वाली तकनीक के इस्तेमाल को बढ़ाया गया। एयर मार्शल व्यवस्था का विस्तार किया गया और विमानों के कॉकपिट दरवाजों को अधिक सुरक्षित बनाया गया।

इन बदलावों का उद्देश्य किसी संभावित हमले को विमान में सवार होने से पहले ही रोकना था।

विदेशी यात्रियों की जांच हुई ज्यादा सख्त

अमेरिका ने 9/11 के बाद अपनी इमिग्रेशन और सीमा सुरक्षा व्यवस्था में भी बदलाव किए।

कुछ देशों से आने वाले विदेशी नागरिकों के लिए अतिरिक्त पंजीकरण, पहचान सत्यापन और पूछताछ जैसी प्रक्रियाएं लागू की गईं। NSEERS जैसी व्यवस्था के तहत कुछ विशेष देशों से आने वाले विदेशी पुरुषों की अतिरिक्त जांच की जाती थी।

यात्रियों की जानकारी का यात्रा से पहले विश्लेषण करने और संभावित जोखिम की पहचान करने पर भी अधिक जोर दिया गया।

एयरलाइंस और विमान कर्मचारियों को संदिग्ध व्यवहार की पहचान तथा ऐसी स्थिति में उचित प्रतिक्रिया देने के लिए प्रशिक्षण देने की व्यवस्था भी विकसित की गई।

खुफिया एजेंसियों के बीच बढ़ा अंतरराष्ट्रीय सहयोग

9/11 के बाद अमेरिका ने यह महसूस किया कि आतंकवाद से मुकाबला किसी एक देश की क्षमता से संभव नहीं है।

इसके बाद अमेरिका ने दूसरे देशों के साथ खुफिया सूचनाओं और कानून-प्रवर्तन से जुड़ी जानकारी साझा करने की व्यवस्था को मजबूत किया। आतंकियों की गतिविधियों, उनके वित्तीय नेटवर्क और संभावित हमलों से संबंधित जानकारी को तेजी से साझा करने पर जोर दिया गया।

इसका उद्देश्य किसी दूसरे देश में मौजूद आतंकी नेटवर्क के बारे में मिली सूचना को समय रहते संबंधित देशों तक पहुंचाना था।

नाटो की भूमिका भी बढ़ी

9/11 के बाद नाटो ने भी आतंकवाद से जुड़े खतरों पर खुफिया सहयोग को मजबूत किया।

नाटो और उसके सहयोगी देशों से मिलने वाली नागरिक और सैन्य खुफिया सूचनाओं के विश्लेषण के लिए विशेष व्यवस्था विकसित की गई। इसका उद्देश्य आतंकवादी खतरे का आकलन करना और संगठन के नेतृत्व को समय पर जरूरी जानकारी उपलब्ध कराना था।

9/11 के बाद दुनिया कैसे बदली?

9/11 के बाद आतंकवाद से मुकाबले का तरीका काफी बदल गया। पहले जहां सुरक्षा का ध्यान मुख्य रूप से किसी हमले के बाद प्रतिक्रिया पर होता था, वहीं इसके बाद हमले से पहले खतरे की पहचान और उसे रोकने पर ज्यादा जोर दिया गया।

एयरपोर्ट स्क्रीनिंग, सीमा निगरानी, वित्तीय लेन-देन की जांच, खुफिया सूचनाओं का आदान-प्रदान और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा सहयोग इस नई रणनीति के महत्वपूर्ण हिस्से बन गए।

हालांकि, इन कड़े सुरक्षा उपायों के साथ नागरिक अधिकार, निजता और सरकारी निगरानी को लेकर कई देशों में बहस भी तेज हुई।

भारत के लिए 9/11 से क्या सीख?

भारत के लिए 9/11 की सबसे बड़ी सीख यह है कि आतंकवाद से मुकाबला केवल किसी हमले के बाद कार्रवाई तक सीमित नहीं रह सकता।

खुफिया एजेंसियों के बीच रियल-टाइम सूचना साझा करना, केंद्र और राज्यों की सुरक्षा एजेंसियों में बेहतर तालमेल, आतंकी फंडिंग पर निगरानी और हथियारों की सप्लाई चेन को रोकना महत्वपूर्ण है।

इसके साथ ही ऑनलाइन कट्टरपंथ और आतंकवादी नेटवर्क के डिजिटल विस्तार पर नजर रखना भी जरूरी है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खुफिया सहयोग को मजबूत करना और संभावित खतरों की पहले पहचान करना किसी बड़े हमले को रोकने में अहम भूमिका निभा सकता है।

9/11 की 25वीं बरसी पर दुनिया के सामने सबसे बड़ा संदेश यही है कि आधुनिक आतंकवाद से मुकाबला केवल हथियारों से नहीं, बल्कि मजबूत खुफिया तंत्र, तकनीक, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और समय रहते खतरे की पहचान से किया जा सकता है।

 

आज भी हर साल 11 सितंबर को अमेरिका और दुनिया के कई हिस्सों में इस हमले में जान गंवाने वाले लोगों को श्रद्धांजलि दी जाती है।

 

 

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