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पोला पर बैलों का ऐसा होगा सम्मान, जानें क्या है खास तैयारी…

रायपुर में आज सजेगा पोला का रंग, बैल दौड़ से लेकर सजावट प्रतियोगिता तक होंगे कई आयोजन

रायपुर। छत्तीसगढ़ की कृषि संस्कृति और लोक परंपरा से जुड़ा प्रमुख पर्व पोला आज यानी 10 सितंबर को पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाएगा। भाद्रपद मास की अमावस्या पर मनाए जाने वाले इस पर्व में किसान अपने कृषि साथी बैलों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। सुबह से ही बैलों को नहलाने-धुलाने, सजाने और पूजा-अर्चना करने का सिलसिला शुरू हो जाता है। शहर से लेकर गांवों तक पोला की रौनक देखने को मिलेगी।

रायपुर के रावण भाटा दशहरा मैदान में भी पोला पर्व के अवसर पर विशेष आयोजन किया जा रहा है। यहां बैल दौड़, बैल सजावट प्रतियोगिता और किसान सम्मान समारोह आकर्षण का केंद्र रहेंगे। कृष्ण मित्र फाउंडेशन के तत्वावधान में होने वाला यह आयोजन लगातार 18वें वर्ष आयोजित किया जा रहा है। सजे-धजे बैलों की जोड़ियां इस कार्यक्रम की खास पहचान रहेंगी।

बैलों की सजावट से लेकर दौड़ तक

पोला के दिन किसान अपने बैलों को विशेष रूप से तैयार करते हैं। उन्हें नहलाने के बाद सींग और खुर सजाए जाते हैं। गले में घुंघरू और घंटियां पहनाई जाती हैं, जबकि रंग-बिरंगे कपड़ों और पारंपरिक सजावट से बैलों को आकर्षक रूप दिया जाता है। इसके बाद विधि-विधान से पूजा और आरती की जाती है।

रायपुर में होने वाले आयोजन में बैल सजावट प्रतियोगिता के साथ बैल दौड़ भी आयोजित की जाएगी। प्रतियोगिता में बेहतर सजावट और स्वस्थ बैलों की जोड़ियों को सम्मानित किया जाएगा। इसके साथ ही किसानों का सम्मान भी किया जाएगा।

पोला सिर्फ त्योहार नहीं, किसानों के लिए आभार का दिन

पोला का संबंध सीधे छत्तीसगढ़ की कृषि व्यवस्था से है। खरीफ फसल के दूसरे चरण के निंदाई-गुड़ाई जैसे काम पूरे होने और खेतों में फसल के बढ़ने की खुशी में किसान अपने बैलों के प्रति आभार जताते हैं। परंपरागत रूप से खेती में बैलों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है, इसलिए इस दिन उन्हें आराम देने और उनकी विशेष देखभाल करने की परंपरा है।

कई इलाकों में मान्यता है कि पोला की पूर्व रात्रि गर्भ पूजन किया जाता है। लोकविश्वास के अनुसार इसी समय अन्न माता गर्भ धारण करती हैं और धान के पौधों में दूध भरने की प्रक्रिया शुरू होती है। इसी वजह से पोला के दिन खेतों में जाने से परहेज किया जाता है।

घरों में बनेंगे छत्तीसगढ़ी पकवान

पोला के दिन घरों में भी विशेष तैयारियां होती हैं। महिलाएं गुड़हा चीला, अनरसा, सोहारी, चौसेला, ठेठरी, खुरमी, बरा, मुरकू, भजिया, मूठिया, गुजिया और तसमई जैसे पारंपरिक पकवान तैयार करती हैं। पूजा के बाद इन पकवानों का आनंद परिवार और रिश्तेदारों के साथ लिया जाता है।

कई क्षेत्रों में बैलों को भी घर में तैयार किए गए पकवान खिलाने की परंपरा है। इस तरह पोला में किसान अपने पशुधन को परिवार के सदस्य की तरह सम्मान देते हैं।

मिट्टी और लकड़ी के बैलों की भी होती है पूजा

पोला की परंपरा सिर्फ असली बैलों तक सीमित नहीं है। बच्चों के लिए मिट्टी और लकड़ी से बने बैलों के खिलौने खरीदे या तैयार किए जाते हैं। इनकी पूजा की जाती है और बच्चे इनके साथ खेलते हुए कृषि जीवन और पारंपरिक संस्कृति से जुड़ते हैं।

छत्तीसगढ़ के कई गांवों में पोला के दौरान युवतियों और बच्चों से जुड़ी अलग-अलग लोक परंपराएं भी देखने को मिलती हैं। कहीं मिट्टी के खिलौने फोड़ने की परंपरा निभाई जाती है तो कहीं कबड्डी और खो-खो जैसे खेलों का आयोजन होता है।

आधुनिक खेती के दौर में परंपरा बचाने की कोशिश

आज खेती में ट्रैक्टर और आधुनिक मशीनों के बढ़ते इस्तेमाल के कारण बैलों पर निर्भरता पहले की तुलना में कम हुई है। इसके बावजूद पोला पर्व के जरिए पशुधन और कृषि संस्कृति से जुड़ी परंपराओं को जीवित रखने का प्रयास किया जा रहा है।

रायपुर में आयोजित होने वाला 18वां पोला उत्सव भी इसी सोच को आगे बढ़ाता है। बैल दौड़, सजावट प्रतियोगिता और किसान सम्मान जैसे कार्यक्रमों के जरिए किसानों, पशुधन और छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को सम्मान देने का संदेश दिया जाएगा।

इस तरह पोला पर्व केवल बैलों की पूजा का दिन नहीं, बल्कि किसान, पशुधन, खेती और छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक संस्कृति के बीच गहरे रिश्ते को याद करने का अवसर भी है।

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