बस्तर दशहरा की 600 साल पुरानी परंपरा: चार फीट गहरे गड्ढे में बैठकर 9 दिन तपस्या करेंगे

रावण दहन से अलग है बस्तर का दशहरा, सिरहासार भवन में निभाई गई जोगी बिठाई की रस्म; अच्छी खेती, सुख-शांति और पर्व के निर्विघ्न आयोजन की कामना से शुरू हुई साधना
जगदलपुर। छत्तीसगढ़ के बस्तर में दशहरा केवल एक धार्मिक त्योहार नहीं, बल्कि सदियों पुरानी जनजातीय संस्कृति, आस्था और परंपराओं का जीवंत प्रतीक है। यहां दशहरा मनाने का तरीका देश के दूसरे हिस्सों से काफी अलग है। इसी विशिष्ट पहचान के बीच बस्तर दशहरा की महत्वपूर्ण रस्म जोगी बिठाई विधि-विधान के साथ संपन्न हुई। जगदलपुर स्थित सिरहासार भवन में आयोजित इस रस्म के साथ नौ दिनों तक चलने वाली कठिन साधना की शुरुआत हुई। इस वर्ष आमाबाल निवासी दौलत कुमार नाग जोगी की भूमिका निभा रहे हैं।
मान्यता है कि जोगी नौ दिनों तक तपस्या करके बस्तर दशहरा के शांतिपूर्ण और निर्विघ्न आयोजन की कामना करते हैं। इस परंपरा में अच्छी खेती, क्षेत्र की खुशहाली और बस्तरवासियों के सुखी जीवन की प्रार्थना भी शामिल है। करीब 600 वर्षों से चली आ रही यह रस्म बस्तर की सांस्कृतिक विरासत और स्थानीय समाज की गहरी आस्था को दर्शाती है।
क्या है जोगी बिठाई? सदियों पुरानी मान्यता से जुड़ी है परंपरा
बस्तर दशहरा की सबसे अनूठी रस्मों में शामिल जोगी बिठाई के पीछे एक पुरानी लोकमान्यता प्रचलित है। कहा जाता है कि कई वर्ष पहले दशहरा पर्व के दौरान हल्बा समाज का एक युवक महल के पास नौ दिनों तक निर्जला उपवास रखकर तपस्या करने बैठ गया था। जब तत्कालीन महाराज को इस बात की जानकारी मिली, तो उन्होंने युवक से पूछा कि वह इतनी कठिन साधना क्यों कर रहा है।
मान्यता के अनुसार, युवक ने बताया कि वह बस्तर दशहरा बिना किसी बाधा के शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न होने की कामना से तपस्या कर रहा है। युवक की आस्था और संकल्प से प्रभावित होकर महाराज ने सिरहासार भवन का निर्माण करवाया और इस परंपरा को आगे बढ़ाने में सहयोग दिया।
कहा जाता है कि तभी से जोगी बिठाई की रस्म बस्तर दशहरा का हिस्सा बन गई। पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती यह परंपरा आज भी उसी धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व के साथ निभाई जाती है।
चार फीट गहरे गड्ढे में बैठकर नौ दिनों तक साधना
जोगी बिठाई की रस्म जितनी विशिष्ट है, उससे जुड़ी तपस्या भी उतनी ही कठिन मानी जाती है। दौलत कुमार नाग के अनुसार, साधना से पहले मावली देवी मंदिर में विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। इसके बाद देवी की तलवार को लाकर लगभग चार फीट गहरे गड्ढे में स्थापित किया जाता है।
जोगी इसी गड्ढे में पालथी मारकर बैठते हैं और लगातार नौ दिनों तक तपस्या करते हैं। इस अवधि में निर्जला उपवास रखा जाता है। दौलत कुमार नाग के मुताबिक, साधना के दौरान न भोजन किया जाता है और न ही पानी पिया जाता है।
यह कठिन अनुष्ठान बस्तर दशहरा की उन परंपराओं में शामिल है, जिनमें धार्मिक आस्था के साथ अनुशासन, संकल्प और समर्पण का विशेष महत्व है।
तीन साल से जोगी बनकर तपस्या कर रहे हैं दौलत कुमार नाग
इस वर्ष जोगी की भूमिका निभा रहे आमाबाल निवासी दौलत कुमार नाग ने बताया कि वह पिछले तीन वर्षों से इस परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं। उनकी साधना का उद्देश्य केवल दशहरा पर्व का निर्विघ्न आयोजन नहीं, बल्कि बस्तर क्षेत्र की खुशहाली भी है।
दौलत कुमार नाग के अनुसार, वह चाहते हैं कि बस्तर में खेती-बाड़ी अच्छी हो, किसानों का जीवन बेहतर रहे और क्षेत्र के लोग सुख-शांति से रहें। उनकी कामना है कि बस्तर दशहरा बिना किसी बाधा के संपन्न हो और पूरे क्षेत्र में समृद्धि बनी रहे।
उनकी यह बात बताती है कि जोगी बिठाई केवल एक धार्मिक रस्म नहीं है। इसके साथ स्थानीय जीवन, कृषि और समाज के कल्याण की भावनाएं भी गहराई से जुड़ी हुई हैं।
देश के दूसरे हिस्सों से अलग क्यों है बस्तर दशहरा?
देश के कई हिस्सों में दशहरा पर्व भगवान श्रीराम की रावण पर विजय और रावण दहन के साथ मनाया जाता है। लेकिन बस्तर दशहरा की पहचान उसकी विशिष्ट धार्मिक परंपराओं, देवी आराधना और जनजातीय सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी है।
यहां दशहरा उत्सव लगभग 75 दिनों तक चलने वाले आयोजनों और विभिन्न पारंपरिक रस्मों के लिए जाना जाता है। इसकी परंपराओं में स्थानीय देवी-देवताओं, जनजातीय समाज और बस्तर के ऐतिहासिक राजपरिवार से जुड़ी मान्यताओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
जोगी बिठाई भी इसी सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा है। नौ दिनों की तपस्या के माध्यम से पर्व की सफलता, शांति और क्षेत्र की समृद्धि की कामना की जाती है। यही वजह है कि बस्तर दशहरा को केवल एक त्योहार के रूप में नहीं, बल्कि यहां की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान के रूप में देखा जाता है।
आस्था, संस्कृति और जनजातीय विरासत का प्रतीक है जोगी बिठाई
आधुनिक समय में भी बस्तर दशहरा की पारंपरिक रस्मों का निर्वहन इस बात का उदाहरण है कि स्थानीय समुदाय अपनी सांस्कृतिक विरासत को किस तरह संजोए हुए हैं। जोगी बिठाई में निभाई जाने वाली साधना, पूजा-अर्चना और नौ दिनों का अनुष्ठान बस्तर की धार्मिक मान्यताओं से गहराई से जुड़ा है।
दौलत कुमार नाग की तपस्या के साथ एक बार फिर यह परंपरा चर्चा में है। बस्तर की पहचान बन चुके दशहरा उत्सव में जोगी बिठाई का अपना अलग महत्व है। यह रस्म क्षेत्र के लोगों की आस्था, अच्छी फसल की उम्मीद और शांतिपूर्ण आयोजन की कामना को एक साथ जोड़ती है।
करीब छह शताब्दियों से चली आ रही इस परंपरा का आज भी निभाया जाना बस्तर की सांस्कृतिक निरंतरता को दर्शाता है। सिरहासार भवन में संपन्न जोगी बिठाई की रस्म के साथ शुरू हुई नौ दिनों की साधना अब बस्तर दशहरा के पारंपरिक आयोजनों का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई है।












