SIR विवाद पर चुनाव आयोग की सफाई, कहा- सभी फैसले सर्वसम्मति से हुए;

रिपोर्ट में दो चुनाव आयुक्तों द्वारा 10 महीनों में कम-से-कम 14 बार आपत्ति दर्ज करने का दावा;
आयोग ने 8 बिंदुओं में अपनी प्रक्रिया और फैसलों पर सफाई दी।
नई दिल्ली। स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर उठे सवालों के बीच आयोग ने विस्तृत सफाई जारी की है। यह विवाद उस रिपोर्ट के बाद सामने आया, जिसमें दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम-से-कम 14 बार कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं पर आपत्ति दर्ज की थी। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि कुछ फैसले उनकी जानकारी या सहमति के बिना आगे बढ़ाए गए।
चुनाव आयोग ने इन दावों के जवाब में कहा है कि अलग-अलग विचार, टिप्पणियां और सुझाव किसी भी संस्थागत निर्णय प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा हैं। आयोग के मुताबिक अंतिम निर्णय पूरे कमीशन की सर्वसम्मति से लिए गए हैं।
आयोग ने 8 बिंदुओं में क्या कहा?
1. संवैधानिक संस्था के रूप में काम करता है ECI
चुनाव आयोग ने कहा कि वह संविधान के अनुच्छेद 324, संबंधित कानूनों और स्थापित संस्थागत प्रक्रियाओं के तहत काम करता है। आयोग के मुताबिक लिखित नोट्स, टिप्पणियां, तकनीकी सुझाव और आंतरिक जांच-व्यवस्था उसकी नियमित कार्यप्रणाली का हिस्सा हैं।
2. सभी आधिकारिक फैसले कानूनी प्रक्रिया के तहत
आयोग ने कहा कि उसके आधिकारिक आदेश, फैसले और प्रशासनिक निर्देश संबंधित कानूनों और निर्धारित प्रक्रियाओं के अनुसार जारी किए जाते हैं।
3. अधिकारियों के सुझाव सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा
ECI के मुताबिक ड्राफ्ट तैयार होने के दौरान आयुक्तों या अधिकारियों द्वारा उठाए गए सवाल और दिए गए सुझाव मतदाता अधिकारों की सुरक्षा तथा चुनावी प्रक्रिया को बेहतर बनाने के उद्देश्य से होते हैं।
4. अलग-अलग विचार होना निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा
आयोग ने कहा कि किसी संस्था में अलग-अलग विचार और टिप्पणियां होना असामान्य नहीं है। अंतिम निर्णय से पहले इस तरह का विचार-विमर्श निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा होता है। आयोग ने यह भी कहा कि केवल तीन चुनाव आयुक्त ही नहीं, बल्कि आयोग का हर अधिकृत अधिकारी चुनाव प्रणाली में सुधार के लिए सुझाव दे सकता है।
5. आयोग ने कहा- सिर्फ आंतरिक टिप्पणियों पर ध्यान देने से पूरी तस्वीर सामने नहीं आती
ECI ने कहा कि 10 महीनों में सामने आए कुछ आंतरिक नोट्स या टिप्पणियों को अलग से देखने के बजाय आयोग द्वारा लिए गए अन्य फैसलों, निर्देशों और पहलों को भी देखा जाना चाहिए। आयोग के अनुसार हाल के महीनों में करीब 40 नई पहल शुरू की गईं और मतदाता सूची के पुनरीक्षण समेत कई चुनावी सुधार किए गए। आयोग ने इन फैसलों को पिछले एक वर्ष में पूरे आयोग द्वारा सर्वसम्मति से लिए गए निर्णय बताया।
6. कई राज्यों में चुनावी प्रक्रिया का हवाला
आयोग ने बिहार, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी, असम और पश्चिम बंगाल में चुनाव एवं चुनाव संबंधी गतिविधियों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन प्रक्रियाओं में बड़े स्तर पर प्रशासनिक और परिचालन कार्य शामिल रहे।
7. डिजिटल सिस्टम और डेटा सुरक्षा पर भी सफाई
आयोग ने कहा कि उसके डिजिटल प्लेटफॉर्म, जिनमें ECINet भी शामिल है, डेटा सुरक्षा प्रोटोकॉल के तहत काम करते हैं। आयोग के मुताबिक IT सुरक्षा जांच, ऑडिट और अन्य साइबर सुरक्षा उपाय लागू हैं तथा मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने की कार्रवाई संबंधित कानूनी अधिकारियों के अधिकार क्षेत्र में होती है।
8. संवैधानिक जिम्मेदारी निभाने की बात
अंत में चुनाव आयोग ने कहा कि वह अपने संवैधानिक दायित्वों को पूरी ईमानदारी से निभाने के लिए प्रतिबद्ध है और लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपनी भूमिका को समझता है।
आखिर विवाद शुरू कैसे हुआ?
यह पूरा मामला Indian Express की एक जांच रिपोर्ट के बाद सामने आया। रिपोर्ट के अनुसार चुनाव आयोग के तीन सदस्यीय पैनल में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम-से-कम 14 बार रिकॉर्ड पर आपत्तियां दर्ज कीं। रिपोर्ट में नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता नाम हटाने और चुनावी IT सिस्टम से जुड़े कुछ मुद्दों पर भी उनकी चिंताओं का उल्लेख किया गया।
रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने कुछ कदमों को लेकर सवाल उठाए और मतदाता डेटाबेस तथा सॉफ्टवेयर के संचालन से जुड़े मुद्दे अधिकारियों के सामने रखे।
चुनाव आयोग ने दावों पर क्या जवाब दिया?
आयोग ने अपनी सफाई में आंतरिक मतभेदों को अंतिम फैसलों से अलग बताते हुए कहा कि अलग-अलग टिप्पणियां निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा हैं। आयोग का कहना है कि SIR सहित उसके हालिया फैसले पूरे आयोग की मंजूरी और सर्वसम्मति से लिए गए हैं।
वहीं, Indian Express की रिपोर्ट में दर्ज आपत्तियों को लेकर विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। इसलिए इस मामले में फिलहाल दो अलग-अलग पक्ष सामने हैं—एक ओर दो आयुक्तों की दर्ज आपत्तियों पर आधारित रिपोर्ट और दूसरी ओर चुनाव आयोग का यह आधिकारिक पक्ष कि अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए।
विपक्ष ने क्या सवाल उठाए?
इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद विपक्षी नेताओं ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और SIR की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए हैं।
विपक्ष की ओर से सबसे प्रमुख सवाल यह है कि अगर आयोग के ही दो सदस्य किसी फैसले या प्रक्रिया पर आपत्ति दर्ज कर रहे थे, तो उन आपत्तियों का निपटारा कैसे हुआ और अंतिम निर्णय किस प्रक्रिया के तहत लिया गया?
विपक्ष ने यह भी सवाल उठाया कि अगर मतदाता सूची से जुड़े फैसलों में आंतरिक स्तर पर मतभेद थे, तो उनकी जानकारी सार्वजनिक क्यों नहीं हुई और संबंधित आपत्तियों पर क्या कार्रवाई की गई।
कुछ विपक्षी नेताओं ने CEC ज्ञानेश कुमार की भूमिका पर भी सवाल उठाते हुए उनसे जवाबदेही की मांग की है।
NCP (SP) नेता सुप्रिया सुले ने इस विवाद को लोकतांत्रिक व्यवस्था से जुड़ा मुद्दा बताते हुए तत्काल सर्वदलीय बैठक की मांग की। उन्होंने CEC से नैतिक जवाबदेही से जुड़े सवाल भी उठाए।
विपक्षी नेताओं की ओर से SIR को लेकर एक और बड़ा सवाल यह है कि मतदाता सूची में नाम हटाने या किसी मतदाता से दस्तावेज मांगने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है और किसी पात्र मतदाता का नाम हटने की स्थिति में उसे पर्याप्त अवसर कैसे मिलेगा।
मतदाता सूची को लेकर भी उठ रहे सवाल
SIR के तहत बड़ी संख्या में मतदाता रिकॉर्ड की जांच की जा रही है। Indian Express की रिपोर्ट में बताया गया कि राष्ट्रीय स्तर पर ड्राफ्ट मतदाता सूचियों से 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए गए हैं, हालांकि इन आंकड़ों में मृत, स्थानांतरित, डुप्लीकेट या अन्य श्रेणियों में आने वाले रिकॉर्ड भी शामिल हैं।
दिल्ली में भी SIR के दौरान लाखों मतदाताओं को नोटिस जारी किए गए हैं। चुनाव आयोग का कहना है कि ऐसे मामलों में मतदाताओं को सत्यापन और जरूरी दस्तावेज प्रस्तुत करने का अवसर दिया जाता है।
आयोग बनाम रिपोर्ट: दोनों पक्षों की बात
इस पूरे विवाद में फिलहाल दो अलग-अलग दावे सामने हैं। Indian Express की जांच रिपोर्ट में दो चुनाव आयुक्तों की ओर से दर्ज की गई कम-से-कम 14 आपत्तियों का विवरण दिया गया है। वहीं चुनाव आयोग का आधिकारिक पक्ष है कि आंतरिक टिप्पणियां और असहमति निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा हैं तथा SIR समेत अंतिम फैसले आयोग की सर्वसम्मति से लिए गए हैं।
इसलिए विवाद का मुख्य सवाल केवल यह नहीं है कि आयुक्तों ने आपत्तियां दर्ज की थीं या नहीं, बल्कि यह भी है कि उन आपत्तियों पर अंतिम स्तर पर क्या निर्णय हुआ, निर्णय लेने की प्रक्रिया क्या थी और उसे लेकर सार्वजनिक पारदर्शिता कितनी रही।












