
नई दिल्ली/इंदौर। दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्रसंघ चुनाव 2026 के नतीजों ने छात्र राजनीति में एक दिलचस्प तस्वीर सामने रखी है। एक तरफ कांग्रेस नेता राहुल गांधी छात्रों के बीच पहुंचकर इंदौर में ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम के जरिए युवाओं और शिक्षा से जुड़े मुद्दों को उठाते नजर आए, वहीं दूसरी तरफ लगभग उसी समय दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ यानी DUSU चुनाव में कांग्रेस समर्थित NSUI चारों केंद्रीय पदों में से एक भी सीट नहीं जीत सकी।
दूसरी ओर, भाजपा से जुड़े छात्र संगठन ABVP ने चार में से तीन प्रमुख पदों पर जीत दर्ज की। अध्यक्ष पद पर यश डबास, सचिव पद पर रिया छाबड़ी और संयुक्त सचिव पद पर लक्ष्य राज सिंह विजयी रहे। उपाध्यक्ष पद पर निर्दलीय उम्मीदवार दीपांशु शौकीन ने जीत दर्ज की।
सवाल सिर्फ हार का नहीं, छात्रों के वोट का है
DUSU चुनाव में इस बार मतदान प्रतिशत 40.46% रहा, जो पिछले दो वर्षों की तुलना में अधिक था। यानी छात्रों की भागीदारी में कमी की बात सीधे तौर पर नहीं कही जा सकती। इसके बावजूद NSUI केंद्रीय पैनल में खाता नहीं खोल सकी।
अध्यक्ष पद के आंकड़े इस मुकाबले को और दिलचस्प बनाते हैं। ABVP के यश डबास को 24,576 वोट मिले, जबकि NSUI के विजय शंकर मीणा को 22,523 वोट मिले। दोनों के बीच अंतर 2,053 वोट का रहा।
यानी अध्यक्ष पद पर मुकाबला एकतरफा नहीं था, लेकिन बाकी प्रमुख पदों पर तस्वीर ABVP के पक्ष में चली गई।
फिर इंदौर और दिल्ली का कनेक्शन क्या है?
इंदौर में राहुल गांधी का छात्र संवाद और दिल्ली यूनिवर्सिटी का चुनाव परिणाम एक ही समय की दो अलग-अलग घटनाएं हैं। इंदौर में छात्रों के बीच पहुंचना कांग्रेस की छात्र और युवा पहुंच की कोशिश का हिस्सा था, जबकि DUSU चुनाव का परिणाम विश्वविद्यालय परिसर के छात्रों के वोट से तय हुआ। इसलिए दोनों घटनाओं को सीधे एक ही वोटिंग ट्रेंड का प्रमाण मानना उचित नहीं होगा।
फिर भी राजनीतिक चर्चा में यह सवाल जरूर उठ रहा है कि कांग्रेस और NSUI की छात्र राजनीति के बीच जमीन पर कितना तालमेल है? दिल्ली में छात्रों का एक बड़ा हिस्सा चुनाव में शामिल हुआ, लेकिन उसका वोट कांग्रेस समर्थित संगठन के पक्ष में नहीं गया।

सबसे बड़ा ट्विस्ट: NSUI से जुड़े रहे दीपांशु निर्दलीय जीते
DUSU चुनाव की सबसे चर्चित कहानी उपाध्यक्ष पद की रही। दीपांशु शौकीन, जो पहले NSUI से जुड़े रहे थे, इस बार निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतरे और 30,615 वोट हासिल कर उपाध्यक्ष बने। उन्होंने ABVP के उम्मीदवार को भी बड़े अंतर से पीछे छोड़ा।
यही परिणाम NSUI के लिए अलग सवाल खड़ा करता है। एक पूर्व NSUI सदस्य का निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीतना बताता है कि छात्र राजनीति में संगठन, उम्मीदवार और स्थानीय समीकरण भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
रिपोर्टों के अनुसार, शौकीन को NSUI से टिकट नहीं मिला था और इसके बाद उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ा। टिकट वितरण को लेकर संगठन के भीतर उठे सवालों और असंतोष की चर्चा भी चुनाव के बाद सामने आई है।
छात्र विरोध कर रहे हैं, फिर वोट अलग क्यों?
DUSU नतीजों के बाद एक बड़ा सवाल यह भी है कि क्या किसी मुद्दे पर छात्रों का विरोध करना और चुनाव में किसी संगठन को वोट देना एक ही बात है?
इस चुनाव की तस्वीर बताती है कि दोनों को सीधे बराबर मानना मुश्किल है। छात्रों के बीच शिक्षा, हॉस्टल, कैंपस सुरक्षा और सुविधाओं जैसे मुद्दे मौजूद रहे, लेकिन चुनावी पसंद अलग तरीके से सामने आई। चुनाव के दौरान कैंपस सुरक्षा और हॉस्टल सुविधाएं प्रमुख मुद्दों में शामिल थीं।
यानी कोई छात्र किसी सरकारी नीति या व्यवस्था पर सवाल उठा सकता है और फिर छात्रसंघ चुनाव में स्थानीय उम्मीदवार या संगठन को वोट दे सकता है। इसी वजह से DUSU के परिणाम को पूरे देश के युवाओं की राजनीतिक पसंद का सीधा प्रतिनिधि मानना भी सावधानी के बिना सही नहीं होगा।
कांग्रेस के सामने अब संगठन और रणनीति का सवाल
NSUI की हार के बाद कांग्रेस के भीतर भी चुनाव की समीक्षा की चर्चा शुरू हो गई है। मीडिया रिपोर्टों में टिकट वितरण, उम्मीदवार चयन, संगठनात्मक रणनीति और छात्र मुद्दों पर पार्टी की पकड़ को लेकर सवाल उठाए गए हैं। कांग्रेस ने चुनाव प्रक्रिया को लेकर कुछ आरोप भी लगाए हैं, जबकि ABVP ने अपनी जीत को छात्र समर्थन के रूप में प्रस्तुत किया है। इन दावों और आरोपों को संबंधित पक्षों के बयानों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
DUSU का संदेश क्या है?
2026 का DUSU परिणाम तीन अलग-अलग बातें एक साथ दिखाता है—ABVP ने चार में से तीन केंद्रीय पद जीते, NSUI कोई केंद्रीय पद नहीं जीत सकी और उपाध्यक्ष पद एक निर्दलीय पूर्व NSUI सदस्य ने हासिल किया।
इसलिए दिल्ली यूनिवर्सिटी का यह चुनाव केवल BJP बनाम Congress की सीधी तस्वीर नहीं है। यहां ABVP की संगठनात्मक ताकत, NSUI की चुनावी रणनीति, निर्दलीय उम्मीदवार की जीत और छात्रों के स्थानीय मुद्दे—सभी ने मिलकर परिणाम को आकार दिया।
इंदौर में छात्रों के बीच राजनीतिक संवाद और दिल्ली में छात्रों का चुनावी फैसला—दोनों को साथ देखकर फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है: क्या आज का छात्र किसी एक राजनीतिक खांचे में फिट होने के बजाय मुद्दे, उम्मीदवार और स्थानीय संगठन के हिसाब से अलग-अलग फैसले कर रहा है? DUSU का 2026 परिणाम इस सवाल को जरूर चर्चा के केंद्र में ले आया है।












