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मानव मल से ये क्या बना डाला? नतीजे देखकर वैज्ञानिक भी हैरान

तेलंगाना से आए मानव अपशिष्ट से तैयार किया बायोचार, 10 फीसदी मिलाने पर कंक्रीट की फ्लेक्सरल मजबूती 42 फीसदी तक बढ़ी

जयपुर। इंसानी अपशिष्ट को आमतौर पर ऐसी चीज माना जाता है, जिससे छुटकारा पाना बड़ी चुनौती है। लेकिन जयपुर की मणिपाल यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने इसी अपशिष्ट को एक उपयोगी निर्माण सामग्री में बदलने की दिशा में चौंकाने वाला प्रयोग किया है। वैज्ञानिकों ने तेलंगाना के वारंगल स्थित फीकल स्लज ट्रीटमेंट प्लांट से मिले मानव मल-कीचड़ से बायोचार तैयार किया और इसे कंक्रीट में सीमेंट के एक हिस्से के विकल्प के तौर पर इस्तेमाल किया। शोध में कुछ अनुपात पर तैयार कंक्रीट की मजबूती सामान्य कंक्रीट से काफी अधिक पाई गई।

आखिर मानव मल से क्या बनाया गया?

यह समझना जरूरी है कि वैज्ञानिकों ने सीधे मानव मल को सीमेंट या कंक्रीट में नहीं मिलाया। पहले वारंगल के फीकल स्लज ट्रीटमेंट प्लांट से प्राप्त सामग्री को सुखाया गया। इसके बाद सीमित ऑक्सीजन वाले वातावरण में लगभग 350 से 450 डिग्री सेल्सियस तापमान पर नियंत्रित गर्मी दी गई। इस प्रक्रिया को पायरोलिसिस कहा जाता है।

इससे जैविक पदार्थ कार्बन से भरपूर ठोस पदार्थ यानी बायोचार में बदल गया। इसके बाद बायोचार को पीसकर महीन पाउडर के रूप में तैयार किया गया और कंक्रीट में सीमेंट की थोड़ी मात्रा को इससे बदला गया।

कितनी मात्रा मिलाने पर सबसे ज्यादा फायदा मिला?

शोधकर्ताओं ने कंक्रीट में सीमेंट के 5, 10 और 15 फीसदी हिस्से की जगह फीकल-स्लज से बने बायोचार का इस्तेमाल करके अलग-अलग नमूनों की जांच की।

91 दिन तक क्योरिंग के बाद 10 फीसदी बायोचार वाले कंक्रीट में कंप्रेसिव स्ट्रेंथ करीब 21 फीसदी बढ़ी, जबकि फ्लेक्सरल स्ट्रेंथ में करीब 42 फीसदी तक बढ़ोतरी दर्ज की गई। 5 फीसदी बायोचार वाले मिश्रण ने भी मजबूती के परीक्षणों में बेहतर प्रदर्शन किया।

हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि जितना ज्यादा बायोचार डालेंगे, कंक्रीट उतना ही मजबूत होता जाएगा। 15 फीसदी प्रतिस्थापन पर प्रदर्शन में गिरावट देखी गई। ज्यादा बायोचार से कंक्रीट की संरचना में अतिरिक्त सच्छिद्रता और कमजोर क्षेत्र बनने की समस्या सामने आ सकती है।

आखिर यह कंक्रीट मजबूत क्यों हुआ?

यही इस पूरी रिसर्च का सबसे दिलचस्प हिस्सा है। बायोचार की संरचना में बड़ी संख्या में सूक्ष्म छिद्र होते हैं। ये छिद्र पानी को अपने अंदर रोक सकते हैं और बाद में धीरे-धीरे छोड़ सकते हैं।

कंक्रीट के मजबूत होने की प्रक्रिया में पानी की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। बायोचार का यह गुण कंक्रीट के अंदर हाइड्रेशन प्रक्रिया को लंबे समय तक सहारा दे सकता है। इससे सीमेंट के कणों की रासायनिक प्रतिक्रिया बेहतर तरीके से आगे बढ़ सकती है और संरचना अधिक मजबूत बन सकती है।

सिलिका भी बढ़ाती है कंक्रीट की ताकत

फीकल-स्लज से बने बायोचार में सिलिका सहित कई खनिज घटक मौजूद पाए गए। सिलिका जैसी सामग्री सीमेंट के हाइड्रेशन से बनने वाले उत्पादों के साथ प्रतिक्रिया करके कंक्रीट की माइक्रोस्ट्रक्चर को बेहतर बनाने में योगदान दे सकती है।

यानी बायोचार सिर्फ खाली जगह भरने वाला पदार्थ नहीं है। इसकी सूक्ष्म संरचना और रासायनिक संरचना, दोनों कंक्रीट के व्यवहार को प्रभावित करती हैं।

पानी सोखने और सिकुड़ने में भी दिखा असर

शोध में केवल कंक्रीट की ताकत ही नहीं जांची गई। वैज्ञानिकों ने पानी के अवशोषण, सिकुड़न, सच्छिद्रता और माइक्रोस्ट्रक्चर जैसे पहलुओं का भी परीक्षण किया। परिणामों से संकेत मिला कि नियंत्रित मात्रा में बायोचार इस्तेमाल करने से कंक्रीट के कुछ टिकाऊपन संबंधी गुणों में भी सुधार हो सकता है।

इससे फायदा क्या होगा?

इस प्रयोग के पीछे दो बड़ी समस्याओं को एक साथ हल करने की कोशिश है।

पहली समस्या है मानव मल-कीचड़ का सुरक्षित प्रबंधन। दूसरी समस्या है सीमेंट निर्माण का पर्यावरणीय प्रभाव। यदि भविष्य में इस तकनीक को बड़े स्तर पर सुरक्षित और मानकीकृत किया जा सका तो अपशिष्ट को लैंडफिल या अन्य निपटान व्यवस्था पर भेजने के बजाय निर्माण सामग्री के एक घटक के रूप में इस्तेमाल करने का रास्ता खुल सकता है।

साथ ही, कंक्रीट में सीमेंट के एक हिस्से को दूसरे पदार्थ से बदलने पर सीमेंट की आवश्यकता कम हो सकती है। इससे निर्माण क्षेत्र के पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने की संभावना बनती है।

क्या अब इसी से घर और सड़क बनने लगेंगे?

अभी ऐसा कहना जल्दबाजी होगी। यह शोध प्रयोगशाला स्तर पर कंक्रीट के नमूनों के परीक्षण पर आधारित है। वैज्ञानिकों ने खुद भी आगे अलग-अलग परिस्थितियों में इसके प्रदर्शन की जांच की जरूरत बताई है।

खास तौर पर लंबे समय की टिकाऊपन, अत्यधिक तापमान, नमक या अन्य कठोर परिस्थितियों में प्रदर्शन और मानव अपशिष्ट से जुड़े संभावित भारी धातुओं के सुरक्षित बंधाव जैसे पहलुओं पर आगे अध्ययन जरूरी है।

जयपुर की रिसर्च ने क्यों खींचा ध्यान?

मणिपाल यूनिवर्सिटी जयपुर के सिविल इंजीनियरिंग विभाग से जुड़े शोधकर्ताओं ने अमेरिका की लुइसियाना टेक यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता के साथ यह अध्ययन किया। शोध का नेतृत्व रघुवेश तिवारी ने किया। अध्ययन साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित हुआ है।

इस खोज की खासियत सिर्फ यह नहीं है कि मानव अपशिष्ट से बनी सामग्री को कंक्रीट में इस्तेमाल किया गया। असली बात यह है कि सही मात्रा में इस्तेमाल किए जाने पर इस अपशिष्ट से तैयार बायोचार ने कंक्रीट के कुछ महत्वपूर्ण यांत्रिक गुणों में सुधार दिखाया। यानी जिसे अब तक सिर्फ कचरा समझा जाता था, उसे वैज्ञानिकों ने संभावित निर्माण संसाधन में बदलने का रास्ता दिखाया है।

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