यहां सूखे ने बदल दी खेती की तस्वीर, मक्का छोड़ सूरजमुखी की ओर भाग रहे किसान

कभी-कभार पड़ने वाला सूखा अब बार-बार लौट रहा, हंगरी-रोमानिया में मक्का की फसल पर बड़ा संकट
बुडापेस्ट/बुखारेस्ट। यूरोप के मध्य और पूर्वी हिस्से में इस बार खेतों का रंग बदल गया है। जहां कभी लहलहाती मक्का की फसल दिखाई देती थी, वहां अब सूखे और गर्मी से झुलसे खेत नजर आ रहे हैं। हंगरी और रोमानिया इस बदलाव के सबसे गंभीर उदाहरण बनकर सामने आए हैं। लगातार गर्म होती गर्मियां, बारिश की कमी और मिट्टी में घटती नमी ने खेती का जोखिम इतना बढ़ा दिया है कि किसान अब मक्का की जगह अपेक्षाकृत सूखा-सहने वाली फसलों, खासकर सूरजमुखी, की तरफ जाने लगे हैं।
यूरोपीय आयोग के अनुमान के मुताबिक 2026 में यूरोपीय संघ की मक्का फसल करीब 5.01 करोड़ टन रह सकती है। यह लगभग दो दशकों का सबसे निचला स्तर है और हाल के तीन साल के औसत से करीब 20 प्रतिशत कम है।
हंगरी में मक्का की हालत सबसे ज्यादा खराब
हंगरी कभी यूरोप के प्रमुख मक्का उत्पादक और निर्यातक देशों में रहा है। लेकिन इस साल हालात तेजी से बदल रहे हैं। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक देश को इस साल पहली बार मक्का आयात करने की स्थिति का सामना करना पड़ सकता है। हंगरी में मिट्टी की नमी की भारी कमी और असामान्य गर्मी ने मक्का की पैदावार को बुरी तरह प्रभावित किया है।
एक रिपोर्ट के अनुसार हंगरी की 2026 की मक्का पैदावार करीब 25 लाख टन रहने का अनुमान है, जो 2018-19 के स्तर के एक-तिहाई से भी कम है।
यानी संकट केवल इस साल की फसल का नहीं है। खेती का पूरा आर्थिक मॉडल दबाव में आता दिखाई दे रहा है।
कभी-कभी आने वाला सूखा अब बार-बार क्यों?
हंगरी के किसानों के लिए सूखा कोई नई बात नहीं है। पहले भी कुछ वर्षों में बारिश कम हुई और फसल को नुकसान पहुंचा। लेकिन अब समस्या की प्रकृति बदल रही है।
लगातार गर्म होते मौसम के कारण मिट्टी से पानी तेजी से उड़ता है। दूसरी तरफ बारिश का समय और वितरण भी अनिश्चित होता जा रहा है। नतीजा यह है कि पौधे को उस समय पानी नहीं मिलता, जब उसे फूल आने और दाना भरने के लिए सबसे ज्यादा पानी चाहिए।
यूरोपीय आयोग के संयुक्त शोध केंद्र ने अगस्त 2026 में बताया कि मध्य और पश्चिमी यूरोप में लगातार गर्मी और असाधारण जल-कमी ने गर्मियों की फसलों की संभावनाओं को काफी नुकसान पहुंचाया। हंगरी को गंभीर रूप से प्रभावित क्षेत्रों में शामिल किया गया।
हंगरी में इस बार गर्मी और सूखे का दबाव कितना रहा?
हंगरी के केंद्रीय बैंक के अधिकारियों के मुताबिक देश में 2026 की गर्मियों में बारिश 20वीं सदी की शुरुआत के बाद के सबसे निचले स्तरों में रही और गर्मी दूसरी सबसे अधिक रही। इन परिस्थितियों ने खास तौर पर मक्का जैसी पानी की ज्यादा जरूरत वाली फसलों पर असर डाला।
यही वह बदलाव है जो किसानों को परेशान कर रहा है—समस्या केवल तापमान बढ़ने की नहीं, बल्कि गर्मी और पानी की कमी के एक साथ आने की है।
मक्का सिर्फ इंसानों के खाने की फसल नहीं
हंगरी में मक्का का संकट इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका बड़ा हिस्सा पशु आहार और संबंधित उद्योगों से जुड़ा है। उपलब्ध कृषि अध्ययनों में हंगरी की मक्का फसल का लगभग एक-तिहाई पशु आहार में इस्तेमाल होने का उल्लेख मिलता है।
हंगरी में 2024 में कुल पशु आहार उत्पादन का करीब 48.3 प्रतिशत हिस्सा पोल्ट्री फीड था।
इसका मतलब है कि मक्का की कमी का असर खेत से आगे जाकर मुर्गी पालन, पशुपालन, मांस और अंडे की लागत तक पहुंच सकता है।
किसान मक्का छोड़कर सूरजमुखी क्यों लगा रहे?
मक्का को फसल के महत्वपूर्ण चरणों में पर्याप्त पानी चाहिए। लंबे समय तक बारिश न होने पर इसका उत्पादन तेजी से गिर सकता है। सूरजमुखी अपेक्षाकृत सूखा-सहनशील फसल है, इसलिए मध्य और दक्षिण-पूर्वी यूरोप के कुछ किसान मक्का की जगह सूरजमुखी की तरफ बढ़ रहे हैं।
यूरोपीय संघ की कृषि रिपोर्ट में भी बताया गया है कि सूखे के बढ़ते जोखिम के कारण मक्का की जगह अधिक सूखा-सहनशील सूरजमुखी को चुनने का रुझान बढ़ रहा है।
लेकिन सूरजमुखी भी समाधान की गारंटी नहीं है। यदि मिट्टी में नमी बहुत कम हो और गर्मी लंबे समय तक बनी रहे तो इस फसल पर भी दबाव बढ़ता है।

रोमानिया में भी वही कहानी
हंगरी से दक्षिण-पूर्व की तरफ रोमानिया में भी मौसम ने खेती का समीकरण बदल दिया है। रोमानिया यूरोप के प्रमुख मक्का उत्पादकों में है, लेकिन बार-बार पड़ रहे सूखे और गर्मी ने यहां भी मक्का की खेती को जोखिम भरा बना दिया है।
2026 में रोमानिया की मक्का फसल करीब 80 लाख टन रहने का अनुमान है। यह 2018-19 के स्तर के आधे से भी कम है। देश का मक्का निर्यात योग्य अतिरिक्त उत्पादन भी काफी घट गया है।
यहां किसान भी मक्का से हटकर सूरजमुखी और दूसरी अपेक्षाकृत सूखा-सहनशील फसलों की तरफ जाने पर विचार कर रहे हैं। लेकिन सिंचाई बढ़ाना भी आसान नहीं है, क्योंकि नदियों और जल स्रोतों में पानी की उपलब्धता खुद गर्मी और सूखे से प्रभावित हो रही है।
यूरोप इतनी तेजी से गर्म क्यों हो रहा है?
यह पूरी कहानी जलवायु परिवर्तन से जुड़ी बड़ी तस्वीर का हिस्सा है।
कॉपरनिकस और विश्व मौसम संगठन के अनुसार यूरोप पृथ्वी का सबसे तेजी से गर्म होने वाला महाद्वीप है। 1980 के दशक के बाद से यूरोप वैश्विक औसत की तुलना में लगभग दोगुनी गति से गर्म हुआ है। कॉपरनिकस के अनुसार 1990 के दशक के मध्य से यूरोप में तापमान बढ़ने की दर लगभग 0.53 से 0.56 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक रही है।
2024 यूरोप के लिए रिकॉर्ड पर सबसे गर्म साल रहा। उसी साल मध्य, पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी यूरोप के कई हिस्सों में रिकॉर्ड गर्मी और सूखे की स्थिति दर्ज हुई।
बढ़ता तापमान खेती के लिए इतना खतरनाक क्यों?
गर्मी बढ़ने का मतलब केवल तापमान का ज्यादा होना नहीं है। इसके कई असर एक साथ होते हैं—
| बदलाव | खेती पर असर |
|---|---|
| तापमान बढ़ना | मिट्टी से पानी तेजी से उड़ता है |
| बारिश में अनिश्चितता | फसल को सही समय पर पानी नहीं मिलता |
| लंबे सूखे | मिट्टी की नमी खत्म होती है |
| हीटवेव | पौधों की वृद्धि और दाना भरने पर असर |
| कम नदी-जल | सिंचाई की क्षमता घटती है |
| बार-बार सूखा | किसान फसल बदलने को मजबूर होते हैं |
तीन साल का औसत और इस साल का संकट
यूरोपीय संघ के स्तर पर इस साल की मक्का फसल को हाल के तीन साल के औसत से लगभग 20 प्रतिशत नीचे बताया गया है। इसे सरल तरीके से समझें तो यदि हालिया तीन साल का औसत उत्पादन 100 माना जाए, तो 2026 का अनुमान लगभग 80 के आसपास बैठता है।
| आंकड़ा | 2026 की स्थिति |
|---|---|
| यूरोपीय संघ की अनुमानित मक्का फसल | 5.01 करोड़ टन |
| हालिया तीन साल के औसत से अंतर | करीब -20% |
| हंगरी की अनुमानित मक्का फसल | करीब 25 लाख टन |
| रोमानिया की अनुमानित मक्का फसल | करीब 80 लाख टन |
| हंगरी की गर्मियों की बारिश | 20वीं सदी की शुरुआत के बाद बेहद कम स्तरों में |
| यूरोप का तापमान बढ़ने की दर | वैश्विक औसत से 2 गुना से अधिक |
सबसे बड़ा खतरा सिर्फ फसल का नहीं
मक्का कम होने का मतलब केवल किसानों की कमाई घटना नहीं है। इसका असर पशु आहार की कीमत, मुर्गी और पशुपालन की लागत, खाद्य महंगाई और यूरोप की मक्का आयात जरूरत पर भी पड़ सकता है।
यूरोपीय संघ को इस साल अधिक मक्का आयात करना पड़ सकता है। हंगरी, जो कभी निर्यातक था, खुद आयातक बन सकता है।
और यही जलवायु परिवर्तन की असली चुनौती है—जब मौसम बदलता है तो सिर्फ खेत नहीं बदलते, पूरी खाद्य श्रृंखला प्रभावित होती है।
क्या किसान खेती बचा पाएंगे?
किसान सिंचाई, फसल बदलने और सूखा-सहनशील किस्मों जैसे उपाय अपना रहे हैं। लेकिन पानी की उपलब्धता ही घटती जाए तो केवल सिंचाई व्यवस्था पर्याप्त नहीं होगी।
यूरोपीय कृषि वैज्ञानिकों के सामने अब बड़ा सवाल यह है कि आने वाले वर्षों में ऐसी खेती कैसे की जाए जो अधिक गर्म, अधिक अनिश्चित और कई जगह ज्यादा सूखे वाले मौसम में भी टिक सके।
हंगरी और रोमानिया की मौजूदा स्थिति इसी बड़े बदलाव की चेतावनी है—जो सूखा कभी असामान्य घटना माना जाता था, वह अब खेती की नियमित योजना का हिस्सा बनता जा रहा है।











