‘लास्ट मैन इन टावर’ रिव्यू: घर और उसूलों की लड़ाई छू जाएगी दिल..

मुंबई की पुरानी सोसायटी, बिल्डर का बड़ा ऑफर और अपने घर को बचाने पर अड़ा एक रिटायर्ड टीचर—फिल्म रिश्तों और मूल्यों के बीच की जंग दिखाती है
मनोज बाजपेयी, दिव्या दत्ता और बोमन ईरानी की फिल्म ‘लास्ट मैन इन टावर’ 11 सितंबर 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है। बेन रेखी के निर्देशन में बनी यह फिल्म अरविंद अडिगा के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित है। फिल्म में एक आम मध्यमवर्गीय परिवार और उसके घर से जुड़े भावनात्मक रिश्तों को कहानी का केंद्र बनाया गया है।
क्या है फिल्म की कहानी?
कहानी मुंबई की एक पुरानी को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसायटी में रहने वाले रिटायर्ड शिक्षक योगेश मिश्रा यानी मास्टरजी के इर्द-गिर्द घूमती है। मनोज बाजपेयी ने इस किरदार को निभाया है।
सोसायटी की पुरानी इमारत को गिराकर वहां एक आधुनिक और आलीशान टावर बनाने की योजना सामने आती है। बिल्डर धर्मेन शाह, जिसका किरदार बोमन ईरानी ने निभाया है, सोसायटी के लोगों को घर खाली करने के बदले बड़ी रकम और बेहतर जीवनशैली का प्रस्ताव देता है।
शुरुआत में कई लोग इस प्रस्ताव को स्वीकार करने के लिए तैयार हो जाते हैं। आखिरकार उन्हें पुराने मकान की जगह बेहतर सुविधाओं वाला नया घर और आर्थिक फायदा नजर आता है। लेकिन मास्टरजी इस प्रस्ताव का विरोध करते हैं।
उनके लिए यह सिर्फ एक इमारत नहीं बल्कि जिंदगीभर की यादों, रिश्तों और भावनाओं से जुड़ा घर है। जैसे-जैसे बाकी लोग बिल्डर के प्रस्ताव के साथ खड़े होते जाते हैं, मास्टरजी की लड़ाई अकेली होती जाती है।

मनोज बाजपेयी ने संभाली पूरी फिल्म
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत मनोज बाजपेयी की अदाकारी है। मास्टरजी के किरदार में वह एक ऐसे मध्यमवर्गीय व्यक्ति की भावनाओं को सामने लाते हैं, जो अपने सिद्धांतों से समझौता करने के लिए तैयार नहीं है।
एक तरफ परिवार और परिस्थितियों का दबाव है तो दूसरी तरफ अपने फैसले और मूल्यों पर कायम रहने की जिद। मनोज बाजपेयी ने इस आंतरिक संघर्ष को बेहद सहज तरीके से पेश किया है।
उनका किरदार किसी पारंपरिक फिल्मी हीरो की तरह नहीं बल्कि एक आम इंसान की तरह दिखाई देता है। यही बात इसे दर्शकों के करीब लाती है।
दिव्या दत्ता का किरदार भी खास
दिव्या दत्ता फिल्म में मास्टरजी की पड़ोसी की भूमिका में हैं। उनका किरदार भी परिस्थितियों के साथ बदलता दिखाई देता है। बेहतर भविष्य की चाह, भावनात्मक जुड़ाव और व्यावहारिक फैसलों के बीच उनका चरित्र कई सवाल खड़े करता है।
दिव्या ने किरदार के अलग-अलग भावों को प्रभावी तरीके से निभाया है। वहीं बोमन ईरानी बिल्डर की भूमिका में नजर आते हैं। सुकांत गोयल मास्टरजी के बेटे का किरदार निभाते हैं। दोनों को स्क्रीन पर अपेक्षाकृत कम समय मिलता है, लेकिन उनकी मौजूदगी कहानी को आगे बढ़ाने में मदद करती है।
निर्देशन में नहीं है दिखावा
निर्देशक बेन रेखी ने फिल्म को बड़े एक्शन या ग्लैमर के बजाय रिश्तों, भावनाओं और संघर्ष पर केंद्रित रखा है। फिल्म में किसी तरह की जबरदस्ती की नाटकीयता या हीरो वाली भव्य एंट्री देखने को नहीं मिलती।
कहानी जिस मध्यमवर्गीय दुनिया को दिखाती है, उसे उसी सादगी के साथ पर्दे पर उतारने की कोशिश की गई है। फिल्म का यही सहज अंदाज इसकी खासियत बनता है।

फिल्म में क्या अच्छा है?
फिल्म की सबसे बड़ी उपलब्धि मनोज बाजपेयी का अभिनय है। इसके अलावा दिव्या दत्ता का बदलता किरदार भी कहानी में दिलचस्पी बनाए रखता है।
फिल्म घर, परिवार, समाज और व्यक्तिगत मूल्यों को लेकर कई सवाल खड़े करती है। दर्शक यह सोचने पर मजबूर हो सकता है कि आर्थिक फायदा मिलने के बावजूद क्या पुरानी यादों और भावनात्मक जुड़ाव की कीमत लगाई जा सकती है?
कहानी सरल है, लेकिन इसके पीछे छिपा संदेश गंभीर है।
कहां कमजोर पड़ती है फिल्म?
फिल्म का सबसे बड़ा कमजोर पक्ष इसकी धीमी रफ्तार है। चूंकि कहानी पूरी तरह ड्रामा और भावनात्मक संघर्ष पर आधारित है, इसलिए इसमें तेज गति वाले या रोमांच पैदा करने वाले दृश्य बहुत कम हैं।
कुछ हिस्सों में फिल्म की गति इतनी धीमी हो जाती है कि दर्शकों को थोड़ी बोरियत महसूस हो सकती है।
देखें या नहीं?
अगर आपको तेज रफ्तार एक्शन, बड़े सेट और लगातार रोमांच वाली फिल्में पसंद हैं तो ‘लास्ट मैन इन टावर’ शायद आपकी पसंद की फिल्म न हो। लेकिन अगर आप सामाजिक मुद्दे, रिश्तों की जटिलता और दमदार अभिनय वाला गंभीर ड्रामा देखना चाहते हैं, तो इसे मौका दिया जा सकता है।
खासकर मनोज बाजपेयी के अभिनय के प्रशंसकों के लिए यह फिल्म देखने लायक है। फिल्म धैर्य मांगती है, लेकिन अंत तक पहुंचते-पहुंचते अपने सवालों के साथ दर्शक को सोचने पर मजबूर करती है।











