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करोड़ों का चंदा, चुनाव में गिने-चुने उम्मीदवार! गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों की फंडिंग पर उठे सवाल

जांच में सामने आया कि करोड़ों रुपये का चंदा पाने वाली कई पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टियों की चुनावी गतिविधियां बेहद सीमित रहीं।

भारत में राजनीतिक दलों की संख्या 2,800 से अधिक है, लेकिन इनमें से केवल 73 दलों को राष्ट्रीय या राज्य स्तरीय पार्टी के रूप में मान्यता प्राप्त है। बाकी पार्टियां पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल यानी आरयूपीपी की श्रेणी में आती हैं। इनमें से कुछ पार्टियों को चुनाव से पहले करोड़ों रुपये का चंदा मिलने के बावजूद उनकी राजनीतिक गतिविधियां बेहद सीमित रहने को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

साल 2023-24 के दौरान सबसे अधिक चंदा पाने वाली छह आरयूपीपी की पड़ताल में फंडिंग और राजनीतिक गतिविधियों के बीच बड़ा अंतर सामने आया। इन छह पार्टियों की कुल आय इतनी अधिक थी कि यह बीजेपी को छोड़कर बाकी पांच राष्ट्रीय दलों की कुल आय से भी ज्यादा बताई गई। इसके बावजूद इन पार्टियों ने 2024 के लोकसभा चुनाव में कुल मिलाकर सिर्फ 15 उम्मीदवार मैदान में उतारे।

गुजरात के आनंद शहर में सत्यवादी रक्षक पार्टी का रजिस्टर्ड कार्यालय एक फ्लैट में मिला। वहां न तो पार्टी का कोई बोर्ड लगा था और न ही कोई पोस्टर दिखाई दिया। पार्टी को 2023-24 में करीब 330 करोड़ रुपये का चंदा मिला था। इसके बावजूद लोकसभा चुनाव में उसने सिर्फ एक उम्मीदवार उतारा।

पार्टी की ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार चुनाव प्रचार पर करीब 8.48 करोड़ रुपये खर्च किए गए, जबकि लगभग 316 करोड़ रुपये जनकल्याण के नाम पर खर्च किए जाने की जानकारी दी गई। पार्टी की अध्यक्ष स्वाति बेन ने चंदे के इस्तेमाल को लेकर कहा कि पैसा चैरिटी में खर्च किया गया, लेकिन उसका रिकॉर्ड नहीं रखा गया।

इसी तरह आम जनमत पार्टी को 2022-23 में 216 करोड़ रुपये और 2023-24 में करीब 620 करोड़ रुपये का चंदा मिला। दिलचस्प बात यह है कि पार्टी ने 2024 के लोकसभा चुनाव में सिर्फ एक उम्मीदवार उतारा था।

पार्टी की पूर्व अध्यक्ष अनामिका पासवान ने दावा किया कि उन्होंने 2022 में पार्टी से इस्तीफा दे दिया था। उनके अनुसार पार्टी का आधार पटना से अहमदाबाद स्थानांतरित किया गया था और बाद में गौरव मिश्रा अध्यक्ष बने। हालांकि अहमदाबाद में पार्टी का रजिस्टर्ड कार्यालय बंद मिला।

गरीब कल्याण पार्टी को भी 2023-24 में करीब 138 करोड़ रुपये का चंदा मिला था। पार्टी ने लोकसभा चुनाव में तीन उम्मीदवार उतारे। जांच के दौरान पार्टी का कार्यालय बंद मिला और उसके अध्यक्ष से भी संपर्क नहीं हो सका।

इन मामलों ने राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे और उनके वास्तविक राजनीतिक कामकाज के बीच संबंध पर सवाल खड़े किए हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे पर टैक्स कानूनों के तहत मिलने वाली छूट का कुछ मामलों में गलत इस्तेमाल किए जाने की आशंका रहती है।

राजनीतिक दलों को दिए गए चंदे पर निर्धारित नियमों के तहत टैक्स में राहत मिल सकती है। इसी व्यवस्था के कथित दुरुपयोग को लेकर टैक्स अधिकारियों और विशेषज्ञों ने चिंता जताई है। आरोप यह है कि कुछ मामलों में राजनीतिक दलों को चंदा देने के नाम पर टैक्स लाभ लिया जाता है और कथित तौर पर कमीशन काटकर रकम वापस की जाती है।

इनकम टैक्स विभाग ने भी पहले आरयूपीपी से जुड़े संदिग्ध वित्तीय लेन-देन और फर्जी चंदे के मामलों पर कार्रवाई की बात कही है। विभाग के अनुसार कुछ मामलों में ऐसी पार्टियों का इस्तेमाल फंड ट्रांसफर, हवाला लेन-देन, सीमा-पार रकम भेजने और फर्जी डोनेशन रसीद जारी करने के लिए किए जाने के सबूत मिले थे।

जांच के दौरान कुछ टैक्स अधिकारियों ने यह भी दावा किया कि कई आरयूपीपी सामान्य राजनीतिक दलों की तरह स्वतंत्र रूप से काम नहीं करतीं। कुछ मामलों में उनके कामकाज में आपसी संबंध होने और चार्टर्ड अकाउंटेंट की महत्वपूर्ण भूमिका होने की बात सामने आई।

स्वतंत्रता अभिव्यक्ति पार्टी के अध्यक्ष सुरेंद्र तिवारी ने भी दावा किया कि उनकी पार्टी को 2023-24 में करीब 219 करोड़ रुपये मिले, लेकिन उन्हें उस रकम के इस्तेमाल पर पूरा नियंत्रण नहीं था। उन्होंने पार्टी के चार्टर्ड अकाउंटेंट पर उन्हें पूरी जानकारी नहीं देने का आरोप लगाया। संबंधित चार्टर्ड अकाउंटेंट ने किसी भी गड़बड़ी से इनकार किया।

आयकर विभाग से जुड़े एक आंतरिक दस्तावेज के हवाले से दावा किया गया कि विभाग ने आरयूपीपी के जरिए टैक्स छूट हासिल करने के लिए किए गए हजारों करोड़ रुपये के संदिग्ध चंदे की पहचान की है। इनमें से बड़ी रकम की वसूली किए जाने की भी बात कही गई है। हालांकि संबंधित विभागों से इस जानकारी की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो पाई है।

चुनाव आयोग ने पिछले वर्ष 800 से अधिक आरयूपीपी को अपनी सूची से हटा दिया था। आयोग के मुताबिक, इन दलों ने पिछले छह वर्षों में किसी भी चुनाव में एक भी उम्मीदवार नहीं उतारा था। हालांकि इन सभी मामलों में वित्तीय अनियमितताएं कारण थीं या नहीं, यह स्पष्ट नहीं है।

पूरे मामले ने राजनीतिक दलों की फंडिंग में पारदर्शिता, चंदे के इस्तेमाल और ऐसी पार्टियों की वास्तविक राजनीतिक गतिविधियों को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। हालांकि किसी भी पार्टी या व्यक्ति पर आर्थिक अपराध में शामिल होने का आरोप केवल इन तथ्यों के आधार पर साबित नहीं होता है और संबंधित आरोपों की आधिकारिक जांच तथा पुष्टि जरूरी है।

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