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फसल बर्बादी और कर्ज से परेशान किसान ने की आत्महत्या, वीडियो में उठाए सरकारी राहत पर सवाल

महाराष्ट्र के नांदेड़ जिले के लिंबगांव थाना क्षेत्र अंतर्गत बोरगांव गांव में एक अत्यंत ही दर्दनाक और झकझोर देने वाली घटना सामने आई है, जहाँ सूखा, भारी-भरकम कर्ज और प्रशासनिक उदासीनता से घिरे 46 वर्षीय किसान शंकर अबावराव क्षीरसागर ने अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली। किसान ने खेत में एक पेड़ से फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। इस खौफनाक कदम को उठाने से पहले उन्होंने अपने मोबाइल फोन से एक भावुक वीडियो रिकॉर्ड कर सोशल मीडिया पर अपलोड किया था, जो अब तेजी से वायरल हो रहा है।

वीडियो में उठाए गए गंभीर सवाल और प्रशासनिक लापरवाही: सोशल मीडिया पर वायरल हुए इस आखिरी वीडियो में किसान शंकर क्षीरसागर ने जिलाधिकारी और स्थानीय प्रशासनिक तंत्र को सीधे तौर पर संबोधित किया था। उन्होंने वीडियो में तीखे सवाल पूछते हुए कहा कि—

  • फसल बर्बादी का मुआवजा न मिलना: इस साल सोयाबीन की पूरी फसल बोई गई थी, लेकिन लंबे समय तक बारिश न होने और भयंकर सूखे के कारण पूरी फसल जलकर नष्ट हो गई, जिसके बावजूद उन्हें आज तक कोई सरकारी राहत या मुआवजा नहीं मिला।

  • कर्ज माफी से वंचित रहना: तमाम सरकारी दावों और घोषणाओं के बावजूद उन्हें किसी भी ऋण माफी योजना का लाभ नहीं मिल सका, जिससे उनके सिर पर कर्ज का बोझ लगातार बढ़ता चला गया।

  • बेटी की मेडिकल फीस माफी का वादा हवा-हवाई: सूखा प्रभावित किसानों के बच्चों की फीस माफ किए जाने के सरकारी और प्रशासनिक आदेशों के बावजूद, उनकी बेटी के मेडिकल कॉलेज की फीस माफ नहीं की गई, जिससे वे मानसिक और वित्तीय रूप से पूरी तरह टूट चुके थे।

मराठवाड़ा क्षेत्र में गहराता कृषि संकट और भयावह आंकड़े: घटना की सूचना मिलते ही परिजनों और पुलिस ने उनकी तलाश शुरू की, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी और उनका शव पेड़ से लटका हुआ मिला। गौरतलब है कि महाराष्ट्र का मराठवाड़ा क्षेत्र इन दिनों पिछले एक दशक के सबसे भीषण सूखे की मार झेल रहा है। राज्य के 358 में से 305 उप-मंडलों (यानी 85 प्रतिशत से अधिक तालुकों) को सूखाग्रस्त घोषित किया जा चुका है।

आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, केवल मराठवाड़ा के आठ जिलों में वर्ष 2026 के शुरुआती छह महीनों में ही 465 किसान अपनी जान दे चुके हैं, जबकि बीते वर्ष 2025 में यह आंकड़ा बढ़कर 1,131 तक पहुंच गया था। इस ताजा घटना ने एक बार फिर ग्रामीण भारत के गंभीर संकट और कागजी सरकारी राहत योजनाओं के जमीनी स्तर पर पूरी तरह विफल होने की पोल खोलकर रख दी है।

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