महल से तिहाड़ तक: जब जयपुर की महारानी ने हिला दी थी इंदिरा गांधी की गद्दी!

भारत के इतिहास में कुछ ऐसी महिलाएं भी हुईं, जिनकी जिंदगी राजमहलों से निकलकर सीधे देश की राजनीति और जेल की सलाखों तक पहुंची। जयपुर की महारानी गायत्री देवी की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। खूबसूरती, शाही ठाठ-बाट और लोकप्रियता के लिए मशहूर गायत्री देवी ने जब राजनीति में कदम रखा तो उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सामने भी अपनी अलग राजनीतिक पहचान कायम की।
गायत्री देवी का जन्म 23 मई 1919 को कूच बिहार के राजघराने में हुआ था। बाद में उनका विवाह जयपुर के महाराजा सवाई मानसिंह द्वितीय से हुआ और वह जयपुर की महारानी बनीं। लेकिन उनकी पहचान केवल राजघराने तक सीमित नहीं रही। उन्होंने सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया और स्वतंत्र पार्टी के टिकट पर जयपुर से लोकसभा चुनाव लड़ा।
1962 का चुनाव उनके राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा मोड़ बना। गायत्री देवी ने जयपुर लोकसभा सीट से भारी बहुमत के साथ जीत दर्ज की। उनकी लोकप्रियता इतनी जबरदस्त थी कि उनकी जीत को उस दौर की सबसे बड़ी चुनावी जीतों में गिना गया। इसके बाद उन्होंने 1967 और 1971 में भी लोकसभा चुनाव जीता।
इंदिरा गांधी से राजनीतिक टकराव
गायत्री देवी और इंदिरा गांधी की राजनीति बिल्कुल अलग दिशा में थी। गायत्री देवी स्वतंत्र पार्टी से जुड़ी थीं, जबकि इंदिरा गांधी कांग्रेस की सबसे प्रभावशाली नेता बन चुकी थीं।
गायत्री देवी ने कांग्रेस में शामिल होने के प्रस्ताव को भी स्वीकार नहीं किया। उनकी राजनीतिक स्वतंत्रता और लगातार चुनावी सफलता ने उन्हें इंदिरा गांधी के सामने एक प्रभावशाली विपक्षी चेहरा बना दिया।
1971 में देश की राजनीति में बड़ा बदलाव आया। तत्कालीन सरकार ने पूर्व रियासतों के राजाओं-महाराजाओं को मिलने वाली प्रिवी पर्स की व्यवस्था समाप्त कर दी। इससे राजघरानों की राजनीतिक और आर्थिक स्थिति पर बड़ा असर पड़ा। गायत्री देवी भी इस बदलाव की मुखर विरोधी थीं।
1975 में लगा आपातकाल और बदल गई जिंदगी
25 जून 1975 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार की सिफारिश पर देश में आपातकाल घोषित किया गया। इस दौरान विपक्षी नेताओं, राजनीतिक कार्यकर्ताओं और सरकार के विरोधियों की बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां हुईं।
इसी दौर में जुलाई 1975 में गायत्री देवी को गिरफ्तार कर लिया गया। उन पर कर कानूनों के उल्लंघन से जुड़े आरोप लगाए गए और उन्हें तिहाड़ जेल भेजा गया। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के मुताबिक उन्होंने करीब साढ़े पांच महीने जेल में बिताए।
एक शाही परिवार में पली-बढ़ी महिला के लिए तिहाड़ जेल का अनुभव बेहद कठिन था। बाद में गायत्री देवी ने अपने जेल अनुभवों का जिक्र किया। जेल में उन्होंने कठिन परिस्थितियों का सामना किया और वहां रहने वाली महिलाओं के बीच बच्चों की पढ़ाई जैसी गतिविधियों में भी मदद की।
क्या सिर्फ इंदिरा गांधी से टकराव के कारण हुई थी गिरफ्तारी?
गायत्री देवी की गिरफ्तारी को लेकर लंबे समय से राजनीतिक विवाद और अलग-अलग दावे सामने आते रहे हैं। कई लेखों और चर्चाओं में इसे इंदिरा गांधी और गायत्री देवी की पुरानी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता से जोड़कर देखा गया है।
हालांकि ऐतिहासिक रिकॉर्ड में उनकी गिरफ्तारी को कर संबंधी आरोपों और आपातकाल के दौरान लागू कानून के तहत की गई कार्रवाई के रूप में दर्ज किया गया है। इसलिए यह कहना कि उन्हें केवल इंदिरा गांधी से राजनीतिक टकराव के कारण जेल भेजा गया था, एक स्थापित तथ्य के बजाय राजनीतिक व्याख्या या दावा माना जाना चाहिए।
जेल से बाहर आईं तो राजनीति से दूरी बना ली
करीब साढ़े पांच महीने जेल में रहने के बाद गायत्री देवी बाहर आईं। इस अनुभव का उनके राजनीतिक जीवन पर गहरा असर पड़ा। इसके बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति से दूरी बना ली और 1976 में अपनी आत्मकथा A Princess Remembers प्रकाशित की।
गायत्री देवी की कहानी इसलिए भी खास है क्योंकि उनका जीवन एक असाधारण विरोधाभास दिखाता है—एक तरफ जयपुर के राजमहल की महारानी, दूसरी तरफ लोकतांत्रिक राजनीति में उतरकर जनता से सीधा समर्थन हासिल करने वाली नेता और फिर आपातकाल के दौरान तिहाड़ जेल की कैदी।
उनकी जिंदगी इस बात की मिसाल बन गई कि भारत की राजनीति में राजघरानों का प्रभाव भले कम हो रहा था, लेकिन कुछ राजघराने के लोग लोकतांत्रिक राजनीति में भी अपनी अलग पहचान बनाने में सफल हुए।












