कल हैलोवीन: भूतों का डर या मजेदार जश्न? जानिए क्यों मनाया जाता है यह त्योहार

31 अक्टूबर को क्यों मनाया जाता है हैलोवीन? जानिए इसकी डरावनी परंपरा के पीछे की दिलचस्प कहानी
दुनियाभर में हर साल 31 अक्टूबर को हैलोवीन मनाया जाता है। इस दिन लोग डरावने कपड़े पहनते हैं, चेहरे पर भूतों और कंकालों जैसे मुखौटे लगाते हैं और घरों को कद्दू, मकड़ी के जाल और डरावनी सजावट से सजाते हैं। बच्चों के लिए यह दिन खास होता है, क्योंकि वे घर-घर जाकर मिठाइयां और चॉकलेट इकट्ठा करते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर भूतों जैसी वेशभूषा पहनकर जश्न मनाने की यह परंपरा शुरू कैसे हुई? इसका इतिहास हजारों साल पुरानी मान्यताओं से जुड़ा हुआ है। आइए जानते हैं हैलोवीन की पूरी कहानी।
कब मनाया जाता है हैलोवीन?
हैलोवीन हर साल 31 अक्टूबर को मनाया जाता है। साल 2026 में यह शनिवार को पड़ रहा है। इस दिन अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन और यूरोप के कई देशों में विशेष आयोजन होते हैं।
लोग अपने घरों को डरावनी थीम में सजाते हैं। बच्चे अलग-अलग किरदारों की वेशभूषा पहनकर पड़ोसियों के घर जाते हैं और मिठाइयां मांगते हैं।
आखिर क्यों मनाया जाता है हैलोवीन?
हैलोवीन की शुरुआत प्राचीन सेल्टिक समुदाय के एक त्योहार ‘सामहेन’ से जुड़ी मानी जाती है। यह त्योहार मुख्य रूप से आयरलैंड, स्कॉटलैंड और आसपास के क्षेत्रों में मनाया जाता था।
प्राचीन मान्यता के अनुसार, 31 अक्टूबर की रात गर्मियों के अंत और सर्दियों की शुरुआत का समय होती थी। लोगों का विश्वास था कि इस रात जीवित लोगों और मृत आत्माओं की दुनिया के बीच की दूरी कम हो जाती है।
लोग बुरी आत्माओं से बचने के लिए आग जलाते थे और डरावने कपड़े पहनते थे। समय के साथ इन परंपराओं में बदलाव आया और हैलोवीन आधुनिक उत्सव का रूप लेता गया।

कद्दू पर डरावना चेहरा बनाने की क्या है कहानी?
हैलोवीन की सबसे पहचानने योग्य परंपरा है कद्दू को खोखला करके उसमें डरावना चेहरा बनाना। इसे ‘जैक-ओ-लैंटर्न’ कहा जाता है।
इस परंपरा के पीछे आयरलैंड की एक पुरानी लोककथा प्रचलित है। कहानी के अनुसार, जैक नाम का एक व्यक्ति अपनी चालाकी से शैतान को धोखा देता है। मृत्यु के बाद उसे न स्वर्ग में जगह मिलती है और न नरक में। उसे अंधेरे में भटकना पड़ता है और रास्ता दिखाने के लिए वह जलता हुआ कोयला एक खोखली शलजम में रखता है।
आयरलैंड में पहले शलजम और चुकंदर को खोखला करके लालटेन बनाई जाती थीं। बाद में जब यह परंपरा अमेरिका पहुंची तो वहां आसानी से उपलब्ध बड़े कद्दू का इस्तेमाल होने लगा।
हैलोवीन पर बच्चे क्यों मांगते हैं चॉकलेट और मिठाइयां?
हैलोवीन की एक लोकप्रिय परंपरा है ‘ट्रिक ऑर ट्रीट’। इसमें बच्चे डरावने या मजेदार कपड़े पहनकर घर-घर जाते हैं और मिठाइयां मांगते हैं।
वे दरवाजे पर जाकर कहते हैं ‘ट्रिक ऑर ट्रीट’। इसका मतलब होता है कि मिठाई दीजिए, वरना कोई शरारत हो सकती है।
आज यह परंपरा मुख्य रूप से बच्चों के मनोरंजन और सामुदायिक उत्सव का हिस्सा बन चुकी है।
हैलोवीन पर क्यों पहनते हैं भूतों और चुड़ैलों के कपड़े?

पुरानी मान्यताओं में लोग बुरी आत्माओं से बचने के लिए डरावने कपड़े और मुखौटे पहनते थे। उनका विश्वास था कि इससे आत्माएं उन्हें पहचान नहीं पाएंगी।
समय के साथ यह परंपरा मनोरंजन में बदल गई। अब लोग भूत, चुड़ैल, पिशाच, कंकाल, सुपरहीरो और फिल्मों के किरदारों की वेशभूषा पहनते हैं।
भारत में भी बढ़ रहा है हैलोवीन का चलन
भारत में हैलोवीन पारंपरिक त्योहार नहीं है, लेकिन बड़े शहरों में इसका चलन धीरे-धीरे बढ़ रहा है।
दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, पुणे और गोवा जैसे शहरों में कई जगह हैलोवीन थीम वाली पार्टियां, स्कूल कार्यक्रम और विशेष आयोजन किए जाते हैं।
युवा और बच्चे डरावने कपड़े पहनकर तस्वीरें खिंचवाते हैं। कई रेस्तरां और मनोरंजन स्थलों पर भी इस मौके पर विशेष सजावट देखने को मिलती है।
हैलोवीन और भारत के भूत-प्रेत से जुड़े त्योहारों में क्या अंतर है?
भारत में भी पितृपक्ष और पितरों की स्मृति से जुड़े कई धार्मिक आयोजन होते हैं। हालांकि हैलोवीन और भारतीय धार्मिक परंपराओं का उद्देश्य और स्वरूप अलग-अलग है।
हैलोवीन आज मुख्य रूप से मनोरंजन, वेशभूषा, मिठाइयों और डरावनी सजावट का उत्सव बन चुका है, जबकि भारत में पितरों से जुड़े आयोजन धार्मिक आस्था और श्रद्धा पर आधारित होते हैं।
इसलिए हैलोवीन सिर्फ डरने का दिन नहीं, बल्कि डरावने किरदारों के साथ मौज-मस्ती करने और पुरानी लोकपरंपराओं को याद करने का एक खास अवसर बन गया है।












