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छत्तीसगढ़ में चावल की कीमतों में उछाल, 40 रुपये किलो तक महंगा हुआ चावल; जानिए वजह

भिलाई। छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है, लेकिन प्रदेश के बाजारों में चावल की बढ़ती कीमतें अब आम लोगों की चिंता बढ़ा रही हैं। भिलाई और दुर्ग के थोक एवं खुदरा किराना बाजारों में दूसरे राज्यों से आने वाली चावल की कुछ लोकप्रिय किस्में 20 से 40 रुपये प्रति किलोग्राम तक महंगी हो गई हैं। इसका सीधा असर मध्यमवर्गीय परिवारों के रसोई बजट पर पड़ रहा है।

हैरानी की बात यह है कि छत्तीसगढ़ में धान का बड़े पैमाने पर उत्पादन होने के बावजूद दक्षिण और मध्य भारत से आने वाले कुछ खास किस्म के चावल खरीदने के लिए उपभोक्ताओं को पहले से अधिक कीमत चुकानी पड़ रही है।

जीरा राइस से लेकर ब्रांडेड चावल तक के दाम बढ़े

Indian long grain Basmati rice in brown wooden bowl and cumin (jeera) spoon on white concrete background

भिलाई-दुर्ग के बाजारों में चावल की कई किस्मों के दाम में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है। उपलब्ध बाजार जानकारी के अनुसार, कीमतों में यह बदलाव सामने आया है।

चावल की किस्म पहले कीमत अब कीमत
जीरा राइस ₹90 प्रति किलो ₹120 प्रति किलो
काली मूंछ चावल ₹65 प्रति किलो ₹85 प्रति किलो
जय श्री राम ब्रांड ₹62 प्रति किलो ₹100 प्रति किलो
अब्बा हुजूर ब्रांड ₹70 प्रति किलो ₹110 प्रति किलो

इन कीमतों के अनुसार, जीरा राइस 30 रुपये, काली मूंछ चावल 20 रुपये, जय श्री राम ब्रांड 38 रुपये और अब्बा हुजूर ब्रांड 40 रुपये प्रति किलोग्राम महंगा हुआ है।

दूसरे राज्यों से आवक प्रभावित होने की बात

India has ample rice stocks, no plans to restrict exports | Today News

बाजार में कीमतें बढ़ने की एक प्रमुख वजह दूसरे राज्यों से आने वाले चावल की आपूर्ति प्रभावित होना बताई जा रही है। जब किसी खास किस्म की आवक घटती है और मांग बनी रहती है, तो उसके खुदरा दाम बढ़ सकते हैं।

हालांकि, अलग-अलग चावल की किस्मों के दाम में अंतर उनके उत्पादन क्षेत्र, गुणवत्ता, सुगंध, मांग और परिवहन लागत पर भी निर्भर करता है। बाजार में आई मौजूदा तेजी के पीछे इन सभी कारकों की अलग-अलग भूमिका की स्वतंत्र पुष्टि अभी उपलब्ध नहीं है।

छत्तीसगढ़ में महीन धान के उत्पादन की मांग

छत्तीसगढ़ में धान की खेती बड़े पैमाने पर होती है। इसके बावजूद बाजार में बिकने वाले सभी प्रकार के सुगंधित और महीन चावल का उत्पादन स्थानीय स्तर पर पर्याप्त मात्रा में हो, यह जरूरी नहीं है।

इसी वजह से स्थानीय बाजार की मांग को देखते हुए महीन धान की खेती और उसके प्रसंस्करण को बढ़ावा देने की मांग उठ रही है। यदि स्थानीय स्तर पर उपयुक्त किस्मों का उत्पादन और उपलब्धता बढ़ती है, तो दूसरे राज्यों पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इसका असर उपभोक्ताओं को मिलने वाली कीमतों पर कितना पड़ेगा, यह उत्पादन लागत, मांग और बाजार व्यवस्था पर निर्भर करेगा।

आम परिवारों के बजट पर पड़ेगा असर

चावल देश के अधिकांश परिवारों के दैनिक भोजन का अहम हिस्सा है। ऐसे में यदि किसी परिवार की खपत 25 किलोग्राम प्रति माह है और चावल की औसत कीमत 20 रुपये प्रति किलो बढ़ जाती है, तो मासिक खर्च में 500 रुपये की वृद्धि हो सकती है।

महंगे चावल का असर विशेष रूप से उन परिवारों पर पड़ सकता है, जो नियमित रूप से जीरा राइस या दूसरी पसंदीदा किस्में खरीदते हैं। उपभोक्ता फिलहाल अलग-अलग दुकानों पर कीमतों की तुलना करके और अपनी जरूरत के अनुसार किस्म चुनकर खर्च नियंत्रित कर सकते हैं।

छत्तीसगढ़ में चावल की कुछ लोकप्रिय किस्मों की कीमतों में आई तेजी ने धान उत्पादन और स्थानीय बाजार में उपलब्ध चावल के बीच के अंतर को सामने ला दिया है। आने वाले दिनों में कीमतों को लेकर स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि दूसरे राज्यों से आपूर्ति कितनी सामान्य होती है और स्थानीय बाजार में मांग के अनुरूप चावल कितना उपलब्ध रहता है।

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